बेटी की सम्पन्ति में अधिकार
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| JUSTICE |
अधिकांश जो सोसाइटीज है अधिकांश जो समाज है वह अपने आप में प्रचार
करें या नहीं पर सच आत्मक हैं और ऐसे पितृसत्तात्मक समाज में अक्सर महिलाओं को
अपने अधिकारों के लिए काफी ज्यादा लड़ाई लड़नी पड़ती है और यह लड़ाई अक्सर कानून
के सामने आती है कानून तक पहुंचती है और कानून को भी कभी-कभी इस लड़ाई में
हस्तक्षेप करना पड़ता है इस संबंध में खाली हाईकोर्ट की गोवा बैंक द्वारा दिया गया
इसमें मुख्य तौर पर इस विषय पर बात की गई कि महिला को शादी के दौरान उसके विवाह के
दौरान दहेज दिया गया हो लेकिन उसके बावजूद भी उसके पिता की संपत्ति में दहेज दिया
गया हो लेकिन उसके बावजूद भी उसके पिता की संपत्ति में उसका अधिकार समाप्त नहीं हो
जाता आज इस वीडियो में हम इसी विषय और इसी निर्णय से संबंधित तमाम पहलुओं को जानने
की कोशिश करेंगे मेरा नाम है अच्छे और आपका स्वागत है दृष्टि आईएएस की नई वीडियो
में चली वीडियो की शुरुआत करते हैं और सबसे पहले वीडियो की रूपरेखा को समझ लेते
हैं तो हमने वीडियो में सबसे पहले न्यूज़ यानी खबर की बात की खबर को जानने के बाद
हम गोवा बेंच के हालत डिसीजन की बात करेंगे इसके बाद हम भारत में बेटियों के
संपत्ति के अधिकार को समझेंगे और जो दो कानून है मिताक्षरा कानून और दयाभागा कानून
इन दोनों कानूनों के बीच सबसे बड़ा अंतर मौजूद है उसको समझने की कोशिश करेंगे इसके
अलावा अंत में आगे की राह पर भी बात करेंगे और एक प्रश्न पर भी चर्चा करेंगे इस
विषय है मुख्य तौर पर सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र दो से संबंधित है और आप इसे
भारतीय समाज और महिलाओं से संबंधित मुद्दे इस तरह के खंडों से जोड़कर देख सकते हैं
कि शुरुआत करते हैं और सबसे पहले गोवा बेंच के हालिया डिसीजन की बात करते हैं
विवाद को भी समझना होगा एक परिवार से जुड़ा हुआ है जिसमें साफ तौर पर पिता की
संपत्ति में बहनों की हिस्सेदारी पर चर्चा की जा रही थी इस पूरे परिवार में जो भाई
मौजूद थे उन भाइयों को मानना था कि जब बहनों की शादी की गई थी उनके विवाह के दौरान
परिवार द्वारा बहुत ज्यादा बहुत ज्यादा ही दहेज दिया गया था ऐसे में इसकी वजह से
पिता की संपत्ति में उनका अधिकार है वह पूरी तरह से समाप्त हो जाता है और इसी चीज
को लेकर जो बहने थी उनके द्वारा मुंबई हाईकोर्ट की बेंच में याचिका दायर की गई थी
याचिका पर दिया गया है क्या डिसीजन है तो बेंच ने स्पष्ट तौर पर अपने डिसीजन में
कहा है कि चाहे परिवार द्वारा बेटी को कितना भी दहेज दिया गया हो लेकिन इसके
बावजूद भी जो बहन है वह परिवार का हिस्सा होना बंद नहीं हो जाती इसके बाद भी दहेज
के बाद भी परिवार का हिस्सा रहती है ऐसे में बहन और भाई की बीच समानता मौजूद है हम
उन दोनों के बीच विभाजन नहीं कर सकते और इसी समानता की वजह से पिता की संपत्ति में
दोनों को एक समान अधिकार प्राप्त है और भाइयों और बहनों के बीच संपत्ति का समान
विभाजन किया जाना चाहिए चाहे वो कितना भी दहेज मिला हो तो यह तो डिसीजन की बात हुई
डिसीजन है यह बहुत ज्यादा विशेष हो जाता है अब आगे बढ़ते हैं और भारत में समग्र
तौर पर बेटियों के संपत्ति के अधिकार की बात करते हैं तो भारत में जो हिंदू कानून
है जो मुख्य तौर पर हिंदू पर्सनल लॉ हैं उन्हें प्राची आधार पर दो हिस्सों में दो
ब्रांच में डिवाइड किया जा सकता है और दूसरी ब्रांच दयाभागा है वह भारत के अधिकांश
हिस्सों में लागू है ऐसे में इसे ध्यान में रखते हुए भारत सरकार द्वारा साल 1955
में
इस मिताक्षरा कानून को सही तरीके से कोडिफाइड तरीके से लागू करने के लिए साल 1955
में
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम को लागू किया गया था अभी जो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम
है यह भारत में उन सभी लोगों पर लागू होता है जो मुस्लिम समुदाय से नहीं है ईसाई
समुदाय से नहीं है फारसी नहीं है और जो यहूदी नहीं है तो इन 4 समुदायों
को छोड़कर जो तमाम समुदाय हैं हिंदू धर्म हो गया जैन लोग लोग लोग इसके अलावा जो
ब्रह्म समाज है आर्य समाज इन अरे समाज इन तमाम लोगों पर यह कानून लागू होता है अब
कानून है यह जो मिताक्षरा ब्रांच है इस ब्रांच में सहभागिता अनीस अन्नदाता को लागू
किया गया है इसकी बात की गई है इसका क्या मतलब है इसका मतलब यह है कि माता पिता की
संपत्ति स्वता ही उनके बच्चों में ट्रांसफर हो जाती है यानी ऑटोमेटिक तरीके से
ट्रांसफर हो जाती है और यही इस पूरे नियम को दयाभागा से अलग बना दी है इस पर हम
आगे बात करेंगे फिलहाल आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं कि भारत में बेटियों को किस
तरह के अधिकार प्राप्त हैं तो साल 2005 से पहले मुख्य तौर पर बेटियों को पिता
की संपत्ति में कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं था लेकिन साल 2005 में
भारत सरकार द्वारा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन किया गया और इस संशोधन के
जरिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम संशोधन किया गठन के जरिए बेटियों को पिता की
संपत्ति में समान अधिकार प्रदान किए गए लेकिन यहां पर विशेष बात यह है कि यह जो
समानता की बात की गई है यह जो क्वालिटी की बात की गई है यह क्वालिटी की बात केवल
पैतृक संपत्ति में ही लागू होते केवल प्रॉपर्टी है उसमें ही लागू होती है अगर किसी
पिता ने अपने पैसों से कोई संपत्ति खरीदी है तो ऐसे मामले में यह क्वालिटी का
सिद्धांत लागू नहीं होता ऐसी स्थिति में यह पिता की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह
अपनी संपत्ति को अपने बच्चों के बीच किस तरह से विभाजित करना चाहते हैं यदि पिता
चाहे ऐसे मामले में यदि उसने कोई संपत्ति अपने पैसों से खरीदी है चाहे तो अपनी
बेटी को ज्यादा दे सकता है या फिर अपने बेटे को ज्यादा दे सकता है या फिर किसी और
को संपत्ति दे सकता है लेकिन अगर वह संपत्ति एंस्टल है तो ऐसी मामले में उस
संपत्ति का समानता आधार पर ही विभाजन किया जाएगा विभाजन के बाद हुई हालांकि यहां
पर एक स्थिति और बनती है कि मान लीजिए कि यदि किसी पिता ने अपने पैसों से कोई
संपत्ति खरीदी थी लेकिन उस संपत्ति का विभाजन करने से पहले ही उस पिता की मृत्यु
हो जाती है और उसके द्वारा कोई वसीयत भी तैयार नहीं की गई है तो ऐसे मामले में
कानून यह कहता है कि उस संपत्ति का बेटे और बेटी के बीच समानता पर विभाजन किया
जाएगा तो यह तो तमाम प्रावधानों की बात हुई तमाम कानूनों की बात हुई इसके अलावा
यहां पर एक मामला और उठता है और सुप्रीम कोर्ट ने अपने तमाम डिसीजंस में इसकी
पुष्टि की है कि बेटी कि जो वैवाहिक स्थिति है उसका जो मैरिटल स्टेटस है वह मैरिटल
स्टेटस के अधिकार को प्रभावित नहीं करता है यानी कई बार लोगों द्वारा इस तरह किया
जाता है कि आप तो बेटी की शादी हो गई है तो उसे अपने अपने पति की संपत्ति प्राप्त
होगी तो ऐसे में उसके पिता की संपत्ति पर उसका कोई अधिकार नहीं है लेकिन यह तक
पूरी तरह से गलत है उसका जो मैरिटल स्टेटस है उसका जो वैवाहिक होना है वह उसके अधिकार
को उसके क्वालिटी के सिद्धांत को बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करता है तो यह तो बात
ही पिता की संपत्ति की लेकिन समान प्रावधान माता की संपत्ति पर भी लागू होते हैं
जो माता की संपत्ति है उसको भी मुख्य तौर पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत ही
विभाजित किया जाता है और हमने पहले ही बात की कि इस पूरे अधिनियम में बेटियों और
बेटों को समान अधिकार दिए गए हैं यानी माता की संपत्ति भी बेटे और बेटियों के बीच
सामान तरीके से विभाजित होती है |

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