(JAY PRAKASH NARAYAN) जयप्रकाश नारायण
- -जयप्रकाश नारायण
- जीवन परिचय (Life introduction)
- निर्वाचन पद्धति के दोष (Defects of Electoral System )–
-
- (1) दलविहीन लोकतन्त्र (Partyless Democracy)—
- (2) परोक्ष चुनाव की नवीन पद्धति (new method of indirect election )-
- (3) सत्ता का विकेन्द्रीकरण एवं सामुदायिक समाज (Decentralization of power and community society)-
- जयप्रकाश और राष्ट्रवाद (Jayaprakash and Nationalism ) —
- जयप्रकाश तथा सर्वोदय दर्शन(Jayaprakash and Sarvodaya Darshan)–
- जयप्रकाश के अनुसार सर्वोदय का आदर्श है (According to Jayaprakash, the ideal of Sarvodaya is):
- (JAIPRAKASH AND THE CONCEPT OF TOTAL REVOLUTION) जयप्रकाश और समग्र क्रान्ति की अवधारणा
- (Some of the main objectives and elements of Jayaprakash's concept of total revolution are as follow)
- (1) लोकतन्त्र को उसकी वास्तविक शक्ति लौटाना ( return democracy to its true power)-
- (2) सत्ता का विकेन्द्रीकरण (decentralization of power) —
- (3) अनीति और अन्याय (iniquity and injustice)
- (4) लोकशक्ति को जाग्रत करने की आवश्यकता (need to awaken people's power)—
- जयप्रकाश नारायण : मूल्यांकन (Jayaprakash Narayan: Evaluation)
-जयप्रकाश नारायण
भारत के समाजवादी विचारकों में जयप्रकाश नारायण का विशिष्ट स्थान है। वे एक समाजवादी थे, गांधीवादी थे और सर्वोदयवादी थे, लेकिन इनमें से किसी के साथ वे जीवन भर बंधकर न रह सके। वस्तुतः उनके जीवन और चिन्तन का एक ही लक्ष्य था और वह था, आर्थिक-सामाजिक न्याय और नैतिकता पर आधारित व्यवस्था की स्थापना करना । इस दृष्टि से उन्होंने 'समग्र क्रान्ति' (Total revolution) की बात कही । इस दिशा में वे एक कदम आगे बढ़े, लेकिन एक ही कदम बढ़ पाये और लोकनायक का 'समग्र क्रान्ति' का विचार एक स्वप्न ही रहा।
जीवन परिचय (Life introduction)
विचार रखा कि भारत की संविधान सभा के
सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होने चाहिए। उन्होंने अपने लिए
संविधान सभा की सदस्यता का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।
देश की स्वतन्त्रता के पश्चात
उन्होंने सरकार में किसी पद पर रहना स्वीकार नहीं किया। 1948 ई. में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
छोड़कर 'भारतीय समाजवादी पार्टी' बनायी। बाद में इस पार्टी ने 'प्रजा समाजवादी पार्टी' का रूप लिया। 1953 में
जवाहरलाल नेहरू तथा जयप्रकाश नारायण के बीच इस समस्या पर बातचीत हुई कि राष्ट्रीय
पुनर्निर्माण तथा विकास के लिए कांग्रेस तथा प्रजा समाजवादी दल के बीच सहयोग किस
प्रकार स्थापित किया जाय, किन्तु
बैतूल के सम्मेलन में समाजवादी नेताओं ने आपसी सहयोग के प्रस्ताव को अस्वीकार कर
दिया।
वस्तुतः 1952 से ही जयप्रकाश विनोबा के नेतृत्व में चलाये जा रहे भूदान और सर्वोदय
आन्दोलन की ओर आकर्षित हो रहे थे। दलगत और सत्ता की राजनीति से उन्हें निराशा हो
रही थी। अतः 1954 में उन्होंने प्रजा समाजवादी दल की
राष्ट्रीय कार्यकारिणी से त्यागपत्र दे दिया और दलगत राजनीति से अपना सम्बन्ध
विच्छेद कर लिया। अप्रेल 1954 में
उन्होंने सर्वोदय आन्दोलन के प्रति 'जीवन दान'
देने की प्रतिज्ञा की। जयप्रकाश का अब यह विचार
हो गया था कि व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन लाने के लिए व्यक्तियों की मनोस्थिति,
उनके सोचने-विचारने के ढंग में परिवर्तन लाना
आवश्यक है और सर्वोदय आन्दोलन से यह सम्भव है। उन्होंने 1954 में शकोदर में एक आश्रम स्थापित किया और सर्वोदय
आन्दोलन तथा ग्रामोत्थान के लिए नये कार्यक्रमों की शुरूआत की।
READ THE👉DR. B.R. AMBEDKAR (डॉ. भीमराव रामजी अम्बेदकर)
सर्वोदय अन्दोलन के प्रति जीवन दान
की प्रतिज्ञा करते हुए भी उन्होंने अपने आपको दलगत राजनीति तथा सत्ता की राजनीति
से ही अलग किया था, सार्वजनिक जीवन के प्रति उनके मनोभाव
में कोई अन्तर नहीं आया था। 10 अगस्त,
1970 को उन्हें 'इन्सानी विरादरी' का
अध्यक्ष बनाया गया और इस संगठन के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रीय जीवन में
साम्प्रदायिक सद्भाव की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्न किये। 1970-72 के दो वर्षों में उन्होंने अपना अधिकांश समय और
शक्ति बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में नक्सलवादी विद्रोह को समाप्त करने में लगायी। 1972
के प्रारम्भ में जयप्रकाश के आदर्शों से प्रेरित
होकर चम्बल घाटी के 400 डाकुओं ने उनके समक्ष आत्म-समर्पण कर
दिया।
1954 से 1973 के बीस वर्षों में जयप्रकाश सर्वोदय आन्दोलन के साथ जुड़े रहे,
लेकिन 1970 से ही सम्भवतया उन्हें यह महसूस होने लगा था कि सर्वोदय से भी
व्यवस्था में परिवर्तन ला पाना सम्भव नहीं है। उन्हें यह देखकर कष्ट होता था कि
भारत के सार्वजनिक जीवन में नैतिकता को भारी आघात पहुंच रहा है और व्यवस्था भी भंग
हो रही है। अतः अब वे राजनीतिक व्यवस्था और सम्पूर्ण व्यवस्था में परिवर्तन लाने
की बात सोचने लगे। 1974 में गुजरात और उसके बाद बिहार राज्य
में भारी असन्तोष की स्थिति थी। इस स्थिति में उन्होंने मार्च 1974 में बिहार की 'छात्र संघर्ष समिति' का
नेतृत्व किया। उनका यह संघर्ष लगभग 15 महीने
तक चलता रहा। इसी बीच 12 जून,
1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय
आया, जिसमें श्रीमती गांधी को अपने लोकसभा
चुनाव में भ्रष्ट तरीके अपनाने का दोषी ठहराया गया था। इस स्थिति में भारतीय राजनीति
के विपक्षी नेताओं सहित जयप्रकाश की मौजूदगी में दिल्ली में 23 जून, 1975 को बैठक बुलायी गयी। बैठक में श्रीमती गांधी से त्यागपत्र मांगने के
लिए विशाल आन्दोलन के कार्यक्रम का मसविदा तैयार किया गया। श्रीमती गांधी ने
त्यागपत्र देने के बजाय 26 जून,
1975 को देश में आन्तरिक आपात् स्थिति
घोषित कर दी और जयप्रकाश तथा विपक्षी दल के प्रमुख नेताओं को नजरबन्द कर दिया गया।
गम्भीर रूप से बीमार पड़ जाने पर 12 नवम्बर,
1975 को जयप्रकाशजी को जेल से रिहा कर
दिया गया।
18 जनवरी, 1977 ई. को लोकसभा के लिए चुनावों की घोषणा की गयी। अब जयप्रकाशजी आगे आये,
उन्होंने जनता पार्टी के गठन, चुनाव प्रचार और जनता पार्टी की सरकार के गठन में
सक्रिय भूमिका निभायी। थोड़े समय बाद उन्होंने इस सरकार से भी निराशा अनुभव की और
खुले रूप में स्वीकार किया कि “यह
सरकार भी जन आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरी है।" जयप्रकाश का महत्व 1977 के
सत्ता परिवर्तन में नहीं, वरन्
इस बात में है कि उन्होंने जनता को अपनी शक्ति से परिचित कराया और शासक वर्ग को जन
शक्ति से परिचित कराकर सदैव के लिए भविष्य के शासक वर्ग को भी चेतावनी देने का
कार्य किया।
उन्होंने समस्त व्यवस्था को लोक
शक्ति से परिचित कराया था, जनता
ने प्रेम और श्रद्धा के साथ उन्हें 'लोक
नायक' का नाम दिया।
1975 में जेल में बन्दी होने के दौरान ही
उनके स्वास्थ्य में गिरावट आ गयी थी और नवम्बर 1975 से ही उनका उपचार चल रहा था, लेकिन
जयप्रकाश का स्वास्थ्य चिन्ता का विषय बना रहा और 8 अक्टूबर, 1979 को
उनके निधन के दुःखद समाचार से पूरा राष्ट्र स्तब्ध रह गया।
सत्ता राजनीति (power politics )–
यप्रकाश के चिन्तन को प्रभावित करने वाले तत्व बाल्यकाल से ही नैतिक तत्वों के प्रति जयप्रकाश का आकर्षण रहा और भगवद्गीता के 'कर्म करो' के सन्देश ने उन्हें प्रेरणा दी। अमरीका में रहते हुए कार्ल मार्क्स और लेनिन की जो भी रचनाएं उनके हाथ लगतीं, वे तुरन्त पढ़ डालते और इन रचनाओं का उन पर प्रभाव पड़ा। एम. एन. राय का भी उन पर प्रभाव पड़ा। भारत लौटने पर वे गांधीजी के प्रभाव में आये और गांधीजी के चिन्तन तथा जीवन का उन पर स्थायी प्रभाव पड़ा। गांधी से उन्होंने इस विचार को अपनाया कि साधनों की पवित्रता आवश्यक है और सार्वजनिक जीवन का आधार नैतिकता होनी चाहिए। इसी प्रभाव के कारण 1940 के बाद वे रूसी साम्यवाद के कटु आलोचक बन गये। 1951 से विनोबा के नेतृत्व में चलने वाले भू-दान तथा ग्राम दान आन्दोलन ने भी उन्हें प्रभावित किया।
प्रो. विमलप्रसाद ने जे. पी. के
चिन्तन को तीन चरणों में विभाजित किया है : (1) मार्क्सवादी युग (1933-40), (2) प्रजातान्त्रिक समाजवाद का युग (1940-52) और (3) सर्वोदयी रुझान का युग (1952-64)। सन् 1973 के बाद के घटनाक्रम के अनुसार जे. पी. के विचार दर्शन में चौथा आयाम
और जोड़ा जाना चाहिए और वह है 'समग्र
क्रान्ति' का। सम्भवतया उनके समस्त चिन्तन में 'समग्र क्रान्ति' का विचार सदैव रहा और इस विचार से प्रेरित होकर ही उन्होंने
मार्क्सवाद. लोकतान्त्रिक समाजवाद और सर्वोदय आन्दोलन को अपनाया।
जयप्रकाश की रचनाएं (Creations of Jayaprakash )—
जयप्रकाश ने अनेक पुस्तकों की रचनाएं कीं। जयप्रकाश की कुछ प्रमुख रचनाओं के शीर्षक इस प्रकार हैं :
1. Towards Total Revolution,
2. समाजवाद, सर्वोदय और लोकतन्त्र,
3. My Picture of Socialism,
4. भारतीय राजव्यवस्था की पुनः रचना :
एक सुझाव
5. जयप्रकाश (सम्पादित) : नारायण देसाई
आदि, मेरी जीवन यात्रा।
जयप्रकाश : राजनीतिक और आर्थिक
चिन्तन
जयप्रकाश के चिन्तन में राजनीतिक और आर्थिक तत्व एक-दूसरे के साथ गहरे रूप में गुंथे हुए हैं। उनके समस्त चिन्तन का अध्ययन निम्न रूपों में किया जा सकता है :
(1) जयप्रकाश और समाजवाद,
(2) जयप्रकाश और लोकतन्त्र,
(3) जयप्रकाश और सर्वोदय,
(4) जयप्रकाश और राष्ट्रवाद,और
(5) जयप्रकाश और समग्र क्रान्ति।
जयप्रकाश और समाजवाद ( Jaiprakash and Socialism )—
भारत के समाजवादी चिन्तकों में
जयप्रकाश को अग्रणी स्थान प्राप्त है। जयप्रकाश सम्भवतया अपने सार्वजनिक जीवन के
प्रारम्भ से ही एक ऐसी व्यवस्था की स्थापना की बात सोच रहे थे, जो आर्थिक-सामाजिक न्याय पर आधारित हो। इसी बात ने उन्हें साम्यवाद और आगे चलकर
लोकतान्त्रिक समाजवाद की ओर आकर्षित किया था। जयप्रकाश अपनी रचना 'समाजवाद क्यों ? (Why Socialism) में बतलाते हैं कि समाजवाद आर्थिक और सामाजिक
पुनर्निर्माण का एक सम्पूर्ण सिद्धान्त है, जिसका उद्देश्य है, समाज
का समन्वित विकास। उनके अनुसार समाजवाद व्यक्तिगत आचरण की संहिता न होकर सामाजिक
संगठन की एक प्रणाली है। जयप्रकाश
आर्थिक समस्याओं के हल को प्राथमिकता देते थे और इसी कारण वे
समाजवाद की ओर आकर्षित हुए।
जयप्रकाश : लोकतान्त्रिक समाजवाद (Jayaprakash: Democratic Socialism)
के पक्षधर जयप्रकाश प्रारम्भ में
कार्ल मार्क्स और लेनिन के चिन्तन की ओर आकर्षित हुए और उन्होंने सोचा था कि शोषण
पर आधारित वर्तमान व्यवस्था को समाप्त कर एक न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना का
कार्य साम्यवाद के आधार पर किया जा सकता है, लेकिन उनके चिन्तन पर प्रारम्भ से ही नैतिक तत्वों का भारी प्रभाव था।
इस कारण जब रूस के साम्यवादी दल द्वारा किये गये अमानुषिक अत्याचारों का विवरण
उनके सामने आया तो उनका हृदय कांप गया और 1940 से ही वे रूसी साम्यवाद के कटु आलोचक बन गये। अब उन्होंने इस विचार को
अपना लिया और जीवन-पर्यन्त उनका यह विचार रहा कि न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना
के लिए बल प्रयोग की पद्धति को अपनाने की न तो कोई आवश्यकता है और न ही औचित्य ।
यह कार्य शान्तिपूर्ण लोकतान्त्रिक पद्धति के आधार पर किया जा सकता है और इस
पद्धति के आधार पर ही किया जाना चाहिए। इस प्रकार जयप्रकाश साम्यवाद के नहीं वरन्
लोकतान्त्रिक समाजवाद के पक्षधर हैं।
जयप्रकाश ने इस बात पर बल दिया कि
समाजवाद भारतीय संस्कृति के विरुद्ध नहीं है। भारत की परम्पराएं शोषणवादी नहीं
हैं। भारत में सदैव ही बन्धुत्व और सहयोग के विचार को सर्वोपरि स्थान दिया गया है।
भारत में संयुक्त परिवार प्रणाली और जाति-व्यवस्था का एक मूल विचार यह रहा है कि
निर्बल और असहाय व्यक्तियों को अन्य व्यक्तियों से पूर्ण सहयोग प्राप्त हो।
वस्तुओं का मिल-बांटकर उपयोग करना भारतीय संस्कृति का मूल आदर्श रहा है। जब भारत
की परम्पराएं उदार समाजवाद के लक्षणों से हैं युक्त तो भारतीय संस्कृति और समाजवाद
को परस्पर विरोधी मानना एक भ्रामक स्थिति ही है।
जयप्रकाश इस बात को तो स्वीकार नहीं
करते कि सभी मनुष्य अपनी अन्तर्निहित क्षमताओं में समान हैं, लेकिन वे इस बात पर बल देते हैं कि वर्तमान समय
की भीषण विषमताएं व्यक्तियों की अन्तर्निहित क्षमताओं में अन्तर का परिणाम नहीं
हैं। इन विषमताओं का मूल कारण यह है कि कुछ व्यक्तियों का उत्पादन के साधनों पर
बहुत अधिक नियन्त्रण है और बहुसंख्यक लोग उत्पादन के साधनों से वंचित हैं। ये कुछ
लोग उत्पादन के साधनों पर अपने नियन्त्रण के बल पर बहुसंख्यक लोगों का शोषण करते
हैं। अतः एक न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना उत्पादन के साधनों का समाजीकरण करके
ही की जा सकती है। 1934 में जयप्रकाश ने अनुभव किया कि
समाजवाद ही भारत की सच्ची स्वाधीनता का आधार बन सकता है। 1940 में उन्होंने रामगढ़ कांग्रेस में प्रस्ताव रखा,
जिसका आशय था कि उत्पादन के प्रमुख और बृहत्
साधनों पर सामूहिक स्वामित्व तथा नियन्त्रण स्थापित किया जाय। उन्होंने आग्रह किया
कि भारी परिवहन, जहाजरानी, खनन तथा भारी उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया जाय ।
जयप्रकाश जानते थे कि भारत और एशिया
के अन्य देशों की मुख्य आर्थिक समस्या कृषक पुनर्निर्माण की है। वे कृषि के
वर्तमान व्यक्तिवादी संगठन को हानिकर, अपव्ययपूर्ण
और शोषण पर आधारित मानते थे। अतः वे समाजवाद के लिए औद्योगिक क्षेत्र को पुनर्गठित
करने के साथ ग्राम जीवन को पुनर्गठित करने के पक्ष में थे। वे चाहते थे कि ग्रामों
को स्वायत्त तथा आत्मनिर्भर इकाइयां बनाया जाय। इसके लिए उन्होंने भूमि सुधार
कानूनों में आमूल सुधार करने की आवश्यकता पर बल दिया। भूमि पर 'वास्तविक किसान' (जोतने वाले) का ही स्वामित्व होना चाहिए। उन्होंने सहकारी तथा सामूहिक
खेती का समर्थन किया और इस बात का प्रतिपादन किया कि 'उत्पादन में वृद्धि सहकारी तथा सामूहिक खेती से ही सम्भव हो सकती है।'
उन्होंने कहा, “वास्तविक समाधान यह है कि उन सभी निहित स्वार्थों का उन्मूलन कर दिया
जाय, किसी भी रूप में भूमि जोतने वाले का
शोषण होता है। किसानों के सभी ऋणों को निरस्त कर दीजिए, जोतों जिनसे को एकत्र करके सहकारी और सामूहिक फार्मों की स्थापना
कीजिए। सहकारी ऋण व्यवस्था और हाट व्यवस्था तथा सहकारी सहायक उद्योगों की स्थापना
कीजिए।" उनका कहना था कि “सहकारी प्रयत्नों के द्वारा ही कृषि तथा उद्योग
के बीच सन्तुलन कायम किया जा सकता है।
जयप्रकाश 'क्रान्तिकारी समाजवाद' (Jayprakash 'Revolutionary Socialism)
(साम्यवाद) के स्थान पर लोकतान्त्रिक समाजवाद के पक्षधर हैं। यह उनके
समाजवादी चिन्तन का मूल तत्व है, लेकिन
इसके अतिरिक्त भी उनके समाजवाद सम्बन्धी चिन्तन की कुछ अन्य भी विशेष बातें हैं :
प्रथम, लोकतान्त्रिक समाजवाद के भारतीय और
विदेशी पक्षधरों की तुलना में भी वे समाजवाद की स्थापना और सफलता के लिए
लोकतान्त्रिक राज्य की अनिवार्यता पर अधिक बल देते हैं। वे अहिंसक जन आन्दोलन के
मार्ग को अपना कर ही समाजवाद की स्थापना करना चाहते हैं।
द्वितीय, उनके समस्त समाजवादी चिन्तन में नैतिकता का पुट कुछ अधिक है। 1940
के बाद उन्होंने समाजवाद सम्बन्धी विचार व्यक्त
करते हुए न केवल साध्य, वरन् साधनों की पवित्रता पर बार-बार
बल दिया है। समाजवाद की सफलता के लिए जयप्रकाश ने व्यक्तियों की इच्छाओं को सीमित
करने की आवश्यकता पर भी बल दिया है। इस प्रकार उन्होंने अपने समाजवाद में अपरिग्रह
के सिद्धान्त को अपनाया है। उनके अनुसार समाजवाद का लक्ष्य व्यक्तियों का केवल
भौतिक सुख या आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति मात्र ही नहीं है। यदि केवल भौतिक सुख
को ही लक्ष्य बना दिया जाय, तो
मनुष्य पशु बनकर रह जायेगा। इसका लक्ष्य तो मानवीय आचरण में नैतिकता के तत्व को
अपनाया जाना है।
तृतीय, समाजवाद की स्थापना में वे मुख्य भूमिका बुद्धिजीवी वर्ग की नहीं,
स्वयं शोषित श्रमिक वर्ग की मानते हैं। इस अहिंसक
जन आन्दोलन में बुद्धिजीवी तो मात्र वैचारिक भूमिका ही निभा सकते हैं। वास्तविक
शक्ति काम करने वाले श्रमिकों तथा पूंजीवादी समाज के शोषित वर्गों के समर्थन में
ही सम्भव है। शोषित वर्ग द्वारा शोषण का विरोध अन्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था
को नष्ट करके एक शोषण रहित समाजवादी समाज की स्थापना में सहायक बनता है।
जयप्रकाश ने समाजवाद की स्थापना के
लिए उत्पादन के साधनों के समाजीकरण पर बल दिया है। वे इस बात से परिचित थे कि इससे
नौकरशाही की शक्तियों में वृद्धि होगी। वस्तुतः उद्योगों के राष्ट्रीयकरण से
नौकरशाही का शासन स्थापित हो सकता है। इस स्थिति को दूर करने के लिए उनके द्वारा
राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही क्षेत्रों में विकेन्द्रित संरचना को अपनाने का सुझाव
दिया गया है। राजनीतिक सत्ता का अधिकाधिक सम्भव सीमा तक विकेन्द्रीकरण हो तथा शहरी
और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय संस्थाओं को महत्वपूर्ण दायित्वों सहित
स्वायत्तता प्राप्त होनी चाहिए। इसी प्रकार समाजवादी अर्थव्यवस्था की संरचना
विकेन्द्रित होनी चाहिए। इसके लिए देश भर में गृह उद्योगों, कुटीर उद्योगों एवं छोटे उद्योगों की स्थापना कर उत्पादन का लक्ष्य
प्राप्त किया जाना चाहिए। राजनीतिक और आर्थिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण जयप्रकाश के
समाजवाद का एक प्रमुख तत्व है।
जयप्रकाश तथा लोकतन्त्र (Jaiprakash and democracy ):
दलविहीन लोकतन्त्र की अवधारणा—
लोकतन्त्र के
सम्बन्ध में जयप्रकाश की विचारधारा को समझने के लिए हमें लोकतन्त्र की मूल अवधारणा
तथा आधुनिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में अन्तर कर लेना होगा। लोकतन्त्र की मूल
अवधारणा का आशय है, जनता का शासन। लोकतन्त्र जनशक्ति पर
आधारित होता है और इसके अनुसार व्यवस्था को बनाये रखने तथा उसमें परिवर्तन लाने का
एकमात्र साधन जनशक्ति ही हो सकता है।
वर्तमान समय में स्वयं जनता द्वारा
शासन-व्यवस्था का संचालन तो सम्भव रहा नहीं है। व्यवहार के अन्तर्गत विश्व के
विभिन्न देशों में जो लोकतान्त्रिक व्यवस्था है वह दलीय व्यवस्था, सामान्यतया प्रत्यक्ष चुनाव की पद्धति, बहुमत पद्धति और सत्ता की राजनीति पर आधारित है।
जयप्रकाश लोकतन्त्र की मूल अवधारणा के पक्षधर हैं, लेकिन आधुनिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के वे कटु आलोचक हैं।
जयप्रकाश के अनुसार लोकतन्त्र की
समस्या मूलतः एक नैतिक समस्या है। लोकतन्त्र के संचालन के लिए संविधान शासन
प्रणाली, राजनीतिक दलों और चुनावों का विशिष्ट
महत्व है, लेकिन जब तक जनता में नैतिक मूल्यों
और आध्यात्मिक गुणों का समावेश नहीं हो जाता, तब तक ये बातें वांछित फल नहीं दे सकतीं। लोकतन्त्र का सफल संचालन तभी
सम्भव है जब देश के नागरिक सत्यप्रिय, अहिंसावादी
और स्वतन्त्रता प्रेमी हों, उनमें
दमन का अहिंसात्मक प्रतिकार करने की क्षमता हो, वे सहयोग और सह-अस्तित्व में पूरा विश्वास रखते हों, उनमें सहिष्णुता, कर्तव्य-परायणता, उत्तरदायित्व
तथा समानता की भावना विद्यमान हो।
जयप्रकाश ने आधुनिक लोकतन्त्र तथा
उसकी कार्यप्रणाली पर तीव्र प्रहार किये हैं। आधुनिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के
प्रति उनका विरोध निम्न चार बातों पर केन्द्रित है :
(1) दलगत राजनीति,
(2) वर्तमान समय की चुनाव व्यवस्था,
(3) सत्ता राजनीति, और
(4) सत्ता का केन्द्रीकरण ।
दलीय पद्धति के दोष—
जयप्रकाश के
अनुसार आज का यह तथाकथित लोकतन्त्र वास्तव में जनता का शासन नहीं वरन् दलीय पद्धति
पर आधारित व्यवस्था है। आधुनिक राजनीतिक दल तो वास्तव में राजनीतिज्ञों का एक ऐसा
छोटा शक्तिशाली समूह है जो जनता के नाम से शासन करता है और लोकतन्त्र एवं स्वशासन
का भ्रम फैलाता है। इस शासन-व्यवस्था में राजनीतिक दलों के कारण सत्ता के लिए
प्रबल होड़-सी लगी हुई है और किसी भी दल ने जनता के ही वास्तविक नियन्त्रण में
रहकर शासन का उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया है। दल पद्धति के ही कारण लोकतन्त्र ने
समाज को तानाशाही शासन भी दिये हैं। प्रथम विश्व युद्ध के बाद इटली, जर्मनी, आदि
राज्यों में जो तानाशाही शासन-व्यवस्थाएं स्थापित हुईं, वे तथाकथित लोकतन्त्र की दलीय पद्धति का ही परिणाम थीं।
दलीय पद्धति पर आधारित यह व्यवस्था
जनता और जन प्रतिनिधि, दोनों को स्वतन्त्र मनन, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का वातावरण
प्रदान नहीं करती। दलीय अनुशासन की वेदी पर विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की
बलि चढ़ जाती है। वस्तुतः दलीय पद्धति जनता को भेड़ की स्थिति में बनाये रखने के
लिए प्रयत्नशील है। दलीय पद्धति के कारण ही आधुनिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था दिखावा
मात्र भी है क्योंकि सभी मुख्य प्रश्नों पर विचार तो पहले ही दल की सभाओं में कर
लिया जाता है। उन्हें संसद में उपस्थित करना तथा उन पर वाद-विवाद करना औपचारिक ही
होता है। इस पर आधुनिक लोकतन्त्र में संसद तथा विधानसभाएं आडम्बर मात्र ही होती हैं।
विशेष तथ्य यह है कि दलीय बैठकों में केवल कुछ सदस्यों के विचार ही प्रभावी होते
हैं।
दलबन्दी से दल के सदस्यों और समस्त
देश का नैतिक पतन भी अनिवार्य है। अपने दल को शक्तिशाली बनाने के उद्देश्य से
सदस्यगण साम, दाम, दण्ड और भेद सभी प्रकार के भले-बुरे उपायों को अपनाते हैं। बहुमत दल
तथा विपक्षी दल दोनों ही सार्वजनिक हितों की उपेक्षा कर दलीय हितों की पूर्ति में
संलग्न रहते हैं। शासन का संचालन जन हित के लिए नहीं, वरन् दलीय हित के लिए होता है। इन सबके अतिरिक्त दलीय पद्धति देश को
परस्पर विरोधी वर्गों में विभाजित करने का कार्य करती है। जयप्रकाश नारायण लिखते
हैं, “दलीय राजनीति का परम्परागत स्वभाव है
कि उसमें सत्ता की प्राप्ति के लिए सभी प्रकार के दूषित संघर्ष होते हैं और यही
बात मुझे अधिक चिन्तित करने लगी। मैंने देखा कि धन, संगठन और प्रचार के साधनों के बल पर विभिन्न दल कैसे अपने को जनता के
ऊपर लाद देते हैं, कैसे जनतन्त्र यथार्थ में दलीय
तन्त्र बन जाता है, कैसे दलीय तन्त्र अपने क्रम से
स्थानीय चुनाव समितियों और निहित स्वार्थों से सम्बद्ध गुटों का राज्य बन जाता है,
कैसे जनतन्त्र केवल मतदान में सिमट और सिकुड़ कर
रह जाता है।'
जयप्रकाश के अनुसार आज का भारत
लोकतन्त्र नहीं, बल्कि दलतन्त्र है जहां पर कि धन,
और प्रचार पर आधारित राजनीतिक दल लोगों पर शासन
करता है।
संगठन
निर्वाचन पद्धति के दोष (Defects of Electoral System )–
जयप्रकाश आधुनिक निर्वाचन पद्धति के भी विरुद्ध
थे। वर्तमान समय में विश्व के अधिकांश देशों और विशेषतया भारत में हजारों-लाखों
मतदाता वाले विशाल निर्वाचन क्षेत्र हैं, जिनमें
प्रत्यक्ष निर्वाचन की पद्धति और दलीय व्यवस्था के आधार पर चुनाव होते हैं।
जयप्रकाश के अनुसार, इन निर्वाचन क्षेत्रों में
उम्मीदवारों के लिए मतदाताओं से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित करना सम्भव नहीं होता।
ऐसी स्थिति में शक्तिशाली केन्द्र नियन्त्रित दलों द्वारा प्रचुर धन और कपटपूर्ण
साधनों से गोलमाल फैलाया जाता है। प्रत्यक्ष निर्वाचन की इस प्रणाली में दोष भरे
पड़े हैं और इससे जनता को कोई वास्तविक शिक्षा प्राप्त नहीं 1 जयप्रकाश नारायण : समाजवाद से सर्वोदय की ओर,
होती। ये चुनाव जनता को कोई
नियन्त्रणकारी सत्ता नहीं सौंपते और न ही राष्ट्र की गम्भीर आर्थिक एवं राजनीतिक
समस्याओं का कोई समाधान प्रस्तुत करते हैं।
जयप्रकाश के अनुसार आज का लोकतन्त्र मात्र सत्ता राजनीति का खेल है,
जिसने प्रत्येक स्तर पर निहित स्वार्थों को जन्म
दिया है। इसने व्यवस्था में अवरोध उत्पन्न किये हैं तथा यह बौद्धिक एवं नैतिक पतन
के लिए उत्तरदायी है। उनके अनुसार, “जहां
तक भारत का सम्बन्ध है, विद्यमान लोकतन्त्र ने सत्ता राजनीति
के जिस खेल को जन्म दिया है, वह खेल
ही देश की तबाही का मूलभूत कारण है।"
सत्ता के केन्द्रीकरण और नौकरशाही के
दोष – जयप्रकाश के अनुसार, आज के
तथाकथित लोकतन्त्र की समस्त व्यवस्था ही ऐसी है कि सत्ता का अत्यधिक केन्द्रीकरण
हो गया है और नौकरशाही की शक्तियों में लगातार वृद्धि होती जा रही है। इस स्थिति
में सरकारी अधिकारियों तथा कर्मचारियों पर जनता की निर्भरता बढ़ रही है तथा
प्रशासन का रवैया सेवक का न होकर स्वामी का हो गया है। आज स्थिति यह है कि सामाजिक
कल्याण के लिए राजकीय सत्ता पर निर्भर रहना पड़ता है। आज की लोकतान्त्रिक व्यवस्था
जनता को अनुप्रेरित नहीं करती, उसकी
वास्तविक शक्ति का विकास नहीं करती और उनमें पहल तथा साहस को प्रोत्साहित नहीं
करती।
निष्कर्ष रूप में जयप्रकाश लिखते हैं
कि “आज के ये तथाकथित लोकतन्त्र वस्तुतः
लोकतन्त्र नहीं, वरन् 'निर्वाचित अल्पतन्त्र' (Elected Oligarchies) हैं, जिनमें जनसाधारण की भूमिका नगण्य ही
होती है।”
विद्यमान लोकतन्त्र में सुधार के लिए
सुझाव
जयप्रकाश आज की तथाकथित लोकतान्त्रिक
व्यवस्था के स्थान पर एक वास्तविक लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थापना के पक्षधर
हैं। वास्तविक लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थापना के सम्बन्ध में उनके सुझाव इस
प्रकार हैं :
(1) दलविहीन लोकतन्त्र (Partyless Democracy)—
इस प्रसंग में जयप्रकाश ने सबसे अधिक
प्रमुख रूप में दलविहीन लोकतन्त्र के विचार का प्रतिपादन किया है। जयप्रकाश ने कहा
था, “दलीय पद्धति राजनीतिक परिप्रेक्ष्य
को भ्रष्ट कर लोकतन्त्र को दूषित करती है और यदि हम चाहते हैं कि जनता अपने विवेक
के अनुसार कार्य करते हुए राजनीतिक स्वतन्त्रता का उपभोग कर सके, तो इस हेतु हमें दलविहीन लोकतन्त्र के आदर्श को
अपनाना होगा।” दलविहीन लोकतन्त्र का आशय यह है कि
शासन के समस्त ढांचे का निर्माण निर्दलीयता के आधार पर किया जाना चाहिए। जनता
द्वारा अपने प्रतिनिधियों का चुनाव और जन प्रतिनिधियों का व्यवस्थापिका सभा में
आचरण दलीय भावना से मुक्त होना चाहिए। जन प्रतिनिधियों द्वारा स्वयं को राजनीतिक
दल के बन्धनों से मुक्त रखते हुए अपने विवेक के अनुसार राष्ट्रीय हित में कार्य
करना चाहिए। दलविहीन लोकतन्त्र का उद्देश्य राजनीति को अधिकतम व्यापक रूप प्रदान करना
है।
(2) परोक्ष चुनाव की नवीन पद्धति (new method of indirect election )-
जयप्रकाश प्रत्यक्ष चुनाव और दलीय व्यवस्था पर आधारित निर्वाचन
पद्धति के भी विरुद्ध थे। वे भारत जैसे देश के प्रसंग में विशेष तौर पर प्रत्यक्ष
चुनाव के स्थान पर परोक्ष निर्वाचन की पद्धति को अपनाने के पक्ष में थे। उन्होंने
जिस चुनाव पद्धति को अपनाने की बात कही, वह इस
प्रकार है : चुनाव ग्राम सभा तथा मतदाता परिषद् के माध्यम से होने चाहिए। एक चुनाव
क्षेत्र में ठीक ढंग से बुलायी गयी आम सभा में प्रत्येक ग्राम सभा मतदाता समिति,
जिसे 'मतदाता
परिषद्' कहा जायगा, के लिए दो प्रतिनिधि चुने। तत्पश्चात् मतदाता परिषद की बैठक हो।
मतदाता परिषद् चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार खड़ा करे। उम्मीदवारों के नाम
आमन्त्रित किये जायें। तत्पश्चात् प्रत्येक प्रस्तावित एवं समर्थित उम्मीदवार के
लिए मतदान हो। वे व्यक्ति जिन्हें अमुक मत संख्या (जैसे, 35 प्रतिशत) से अधिक मत मिल जायें, वे उस क्षेत्र से राज्य विधायिका-संसद के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिये
जायें । लोकतन्त्र के उचित संचालन के लिए यह अपेक्षित है कि मतों का विभाजन
यथासम्भव कम हो। प्रत्येक मतदाता परिषद् एक सीट के लिए केवल एक ही उम्मीदवार खड़ा
करे ।
जयप्रकाश द्वारा प्रस्तावित यह
निर्वाचन पद्धति ग्राम सभा को प्रशासकीय मशीनरी का मूल आधार मानकर चलती है और
लोकतन्त्र के ऊपरी स्तर को निम्न स्तर से मिलाती है।
1 7 अक्टूबर, 1968 को जयप्रकाश नारायण द्वारा संवाददाता सम्मेलन में दिये गये वक्तव्य का
एक अंश।
(3) सत्ता का विकेन्द्रीकरण एवं सामुदायिक समाज (Decentralization of power and community society)-
विद्यमान लोकतन्त्र को उसकी बुराइयों से मुक्त
करने के लिए जयप्रकाश लोकतन्त्र को पुनर्गठित कर उसे सामुदायिक समाज एवं
विकेन्द्रीकरण पर आधारित करना चाहते थे। जयप्रकाश ने प्राचीन भारतीय समाज के
क्षेत्रीय एवं व्यवसायात्मक समुदायों का आदर्श अपनाने पर जोर दिया है। जयप्रकाश का
सुझाव था कि लोकतन्त्र में विकेन्द्रीकरण की योजना को कठोरतापूर्वक लागू किया जाना
चाहिए।
जयप्रकाश समाज का पुनर्निर्माण
पिरामिड की भांति करना चाहते हैं अर्थात् वे सबसे नीचे के स्तर पर ग्रामीण समाज और
उस पर क्षेत्रीय, जिला स्तरीय, प्रान्त स्तरीय एवं राष्ट्रीय समुदायों की स्थिति स्वीकार करते हैं।
इनमें से प्रत्येक स्तर पर सामुदायिक जीवन दृष्टिकोण विकसित करना होगा क्योंकि
समस्त समुदायों के कार्यों को सामान्यतया सामुदायिक जीवन ही एकीकृत कर सकता है।
जयप्रकाश के अनुसार लोकतन्त्र की
सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि व्यक्ति राज्य पर कम-से-कम निर्भर रहें। लोकतन्त्र के
पूर्ण विकास के लिए जरूरी है कि जनता विभिन्न प्रकार के आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों के माध्यम से
सार्वजनिक कार्यों में अधिकाधिक भाग ले। ऐसी लोक संस्थाओं की स्थापना की जाय जिनसे
व्यक्ति स्वयं अपने कार्य करते हुए आत्मनिर्भर हों और अपने जीवन स्तर को ऊंचा
उठाने के लिए कटिबद्ध रहें। इसके लिए ग्रामों में सहकारी समितियों और शहरी क्षेत्र
में श्रमिक संगठनों की स्थापना की जाय तथा युवा वर्ग एवं बालकों को स्वैच्छिक
संघों के माध्यम से सेवा करने के लिए प्रेरित किया जाय।
जयप्रकाश और राष्ट्रवाद (Jayaprakash and Nationalism ) —
जयप्रकाश
ने अपने चिन्तन और जीवन में राष्ट्रवाद को गहरे रूप में अपनाया था । स्वतन्त्रता
प्राप्ति के बाद वे भारत की एकता के लिए भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा का समर्थन
करते हैं। जयप्रकाश के अनुसार, भारत
में 'विविधताओं के बीच एकता' की स्थिति है और भारत जैसे देश में
धर्मनिरपेक्षतावाद ही राष्ट्रवाद का आधार हो सकता है। वे हिन्दू राष्ट्रवाद की
अवधारणा के आलोचक हैं और उनका कहना है कि साम्प्रदायिक और धार्मिक आधार पर हिन्दू
राष्ट्र की स्थापना स्वयं हिन्दू सम्प्रदाय के लिए घातक होगी। हिन्दू राष्ट्रवाद
की अवधारणा धर्मनिरपेक्षता विरोधी है।
जयप्रकाश के अनुसार राष्ट्रीय एकता
के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए राज्य का धर्मनिरपेक्ष होना ही आवश्यक नहीं है।
आवश्यकता इस बात की है कि राज्य के साथ-साथ सामाजिक जीवन में भी और पूरे मन से
धर्मनिरपेक्षता के आदर्श को अपनाया जाय। भारतीय एकता की प्रक्रिया मूलतः बौद्धिक
एवं आत्मिक चेतना की प्रक्रिया है। अतः भारतीय समाज राष्ट्रवाद के साम्प्रदायिक
पक्ष को अपने से दूर रखने के लिए जितना सचेत होगा, उतना ही राष्ट्रीय एकता को बल प्राप्त होगा।
जयप्रकाश तथा सर्वोदय दर्शन(Jayaprakash and Sarvodaya Darshan)–
जयप्रकाश गांधीजी और गांधीजी के बाद
विनोबा द्वारा प्रतिपादित सर्वोदय दर्शन में विश्वास करते थे और 1954 में उन्होंने सर्वोदय आन्दोलन को जीवन दान दे
दिया था। सर्वोदय का शाब्दिक और भावात्मक अर्थ है : किसी एक वर्ग विशेष का नहीं,
वरन् सभी का कल्याण । यह सर्वजन हित पर आधारित
आदर्श सामाजिक व्यवस्था है। सर्वोदय के पांच आधार हैं: (1) जाति रहित और वर्ग रहित समाज की स्थापना, (2) सार्वजनिक क्षेत्र में स्वच्छ और कुशल प्रशासन, (3) सामाजिक व्यवस्था का आधार विकेन्द्रीकरण,
(4) समस्त शक्ति जनता को प्राप्त होना और (5) अधिकारी वर्ग द्वारा अपने आपको जनता का स्वामी
नहीं, वरन् सेवक समझना ।
जयप्रकाश के अनुसार सर्वोदय का आदर्श है (According to Jayaprakash, the ideal of Sarvodaya is):
एक अहिंसक शोषण रहित और सहकारिता के आधार पर स्थापित समाज। यह
व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन लाने का एक साधन है। सर्वोदयी समाज में वर्तमान समय
की प्रतियोगी अर्थव्यवस्था के स्थान पर सहयोग पर आधारित सामाजिक अर्थव्यवस्था
स्थापित की जायगी। कृषि भूमि पर स्वामित्व का अधिकार जमीन जोतने वाले का होगा।
बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाया जायगा और उस पर सामूहिक कृषि की जायगी। बैंक और
बीमा कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण किया जायगा, लेकिन उद्योगों और आर्थिक शक्ति का विकेन्द्रीकरण किया जायगा। ग्राम
विकास सर्वोदय का एक प्रमुख आदर्श हैं और सर्वोदयी समाज में सार्वजनिक राजस्व का 50
प्रतिशत भाग ग्राम पंचायतों द्वारा खर्च किया
जायगा। जयप्रकाश के अनुसार ग्राम पंचायतों को फिर से सबल बनाये जाने की आवश्यकता
है और उनका सुझाव है कि ग्राम पंचायतों में बहुमत निर्णय के स्थान पर सर्वसम्मत
निर्णय की पद्धति को अपनाये जाने की आवश्यकता है।
(JAIPRAKASH AND THE CONCEPT OF TOTAL REVOLUTION) जयप्रकाश और समग्र क्रान्ति की अवधारणा
समग्र क्रान्ति जयप्रकाश के चिन्तन
की एक प्रमुख अवधारणा है। सम्भवतया अपने चिन्तन के प्रारम्भ से ही समग्र क्रान्ति
की बात उनके मस्तिष्क में थी। समग्र क्रान्ति से उनका आशय व्यवस्था में मूलभूत
परिवर्तन और ऐसी व्यवस्था की स्थापना से है जो आर्थिक-सामाजिक न्याय पर आधारित हो।
समग्र क्रान्ति की इस धारणा के अनुसार समाज की बाहरी संरचना में परिवर्तन लाना ही
पर्याप्त नहीं है, अपितु मानवीय चेतना में भी उतना ही
सार्थक परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। 1974 में अपने एक भाषण में समग्र क्रान्ति के बाद स्थापित समाज व्यवस्था की
व्याख्या जयप्रकाश ने इस प्रकार की थी : "यह एक ऐसा लोकतान्त्रिक समाज होगा, जिसमें प्रत्येक नागरिक श्रमिक होगा और प्रत्येक नर-नारी में समानता
होगी, सबको समान अवसर प्राप्त होंगे।
व्यक्तियों की आय में इतना अन्तर नहीं होगा कि वर्ग भेद खड़े हो जायें। सारी
सम्पत्ति का स्वामी समाज होगा, प्रगति
योजनाबद्ध होगी, श्रम आनन्द से समन्वित होगा, जीवन आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न, सम्पूर्ण और सुन्दर होगा।""
1974 में ही अपने एक अन्य भाषण में
जयप्रकाश ने कहा था, “सम्पूर्ण क्रान्ति का लक्ष्य है
भारतीय लोकतन्त्र को वास्तविक तथा सुदृढ़ बनाना, जनता का सच्चा राज कायम करना, समाज
से अन्याय तथा शोषण आदि का अन्त करना, एक
नैतिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक क्रान्ति
लाना।”
1974 में जयप्रकाश ने संगठित राजनीति से
संन्यास लेकर अपने आपको सर्वोदय के प्रति समर्पित किया था, लेकिन संगठित राजनीति से संन्यास लेने के बाद भी वे भारतीय लोकतन्त्र
की विसंगतियों को भूले नहीं थे। जयप्रकाश ने यह भी देख लिया था कि समाज में इतने
अधिक प्रकार की विषमताएं हैं कि सर्वोदय के समन्वय के सिद्धान्त के आधार पर उनका
निदान कर पाना सम्भव नहीं है। अब उन्होंने इस विचार को अपनाया कि इन विषमताओं को
दूर करने के लिए एक ओर तो समाज की स्वैच्छिक शक्ति की ओर से प्रयत्न किये जायें
तथा दूसरी ओर राज व्यवस्था के माध्यम से भी प्रयत्न हों। जयप्रकाश ने 'समग्र क्रान्ति' की अपनी इस धारणा का प्रतिपादन विशेष रूप से 1974-75 के वर्षों में बिहार आन्दोलन का नेतृत्व करते समय
किया, यद्यपि उनके मानस में यह धारणा
निश्चित रूप में पहले से थी।
(Some of the main objectives and elements of Jayaprakash's concept of total revolution are as follow)
जयप्रकाश की समग्र
क्रान्ति की अवधारणा के कुछ प्रमुख उद्देश्य और तत्व इस प्रकार हैं :
(1) लोकतन्त्र को उसकी वास्तविक शक्ति लौटाना ( return democracy to its true power)-
जयप्रकाश इस बात पर बहुत आन्दोलित थे कि आज की लोकतान्त्रिक
व्यवस्था में पांच वर्ष में एक बार अपने प्रतिनिधि चुनकर जनता के अधिकार और
कर्तव्यों की इतिश्री हो जाती है और व्यवहार के अन्तर्गत जनता का अपने इन
प्रतिनिधियों पर कोई नियन्त्रण नहीं रहता। उनका विचार है कि मतदाताओं का कर्तव्य
मतदान के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता, वरन
निर्वाचित प्रतिनिधि और मतदाता के बीच नियमित सम्पर्क रहना चाहिए ताकि वे परस्पर
उत्तरदायित्व का ठीक ढंग से निर्वाह कर सकें।
लोकतन्त्र को उसकी वास्तविक शक्ति
लौटाने के लिए उनके सुझाव हैं : प्रथम, सत्ता
पर प्रभावपूर्ण और वास्तविक नियन्त्रण की व्यवस्था होनी चाहिए और इस प्रसंग में
प्रेस, न्यायपालिका, विपक्ष और बुद्धिजीवी वर्ग की अपनी भूमिका होती है। जयप्रकाश का कहना
था कि प्रेस और न्यायपालिका वास्तविक तथा सम्पूर्ण अर्थों में पूर्ण स्वतन्त्र
होनी चाहिए तथा उनमें निर्भयता की भावना होनी चाहिए। बुद्धिजीवी वर्ग स्वतन्त्र
चेतना शक्ति और नैतिक साहस से युक्त हो तथा विपक्ष इतना सबल हो कि शासक दल का
विकल्प बन सके।
लोकतन्त्र को वास्तविक बनाने के
प्रसंग में जयप्रकाश ने दो सुझाव और दिये हैं: प्रथम, जनसमितियों की स्थापना और द्वितीय, प्रत्याह्वान (Recall) की व्यवस्था।
जयप्रकाश का कहना था कि स्थानीय, प्रान्तीय
और राष्ट्रीय स्तर पर जन समितियों की स्थापना की जानी चाहिए। इन समितियों का कार्य
होगा, अपने प्रतिनिधियों तथा शासन के
कार्यों की देख-रेख और उन पर नियन्त्रण। स्थानीय स्तर की जनसमिति अपने
प्रतिनिधियों (विधायक और सांसद) से निरन्तर सम्पर्क बनाये रखे, उनके कार्यों की देख-रेख करे और उन पर नियन्त्रण
रखे। प्रान्तीय स्तर और राष्ट्रीय स्तर की जनसमिति क्रमशः प्रान्तीय सरकार और
राष्ट्रीय सरकार के कार्य की देख-रेख करें और उन पर नियन्त्रण रखें। द्वितीय कदम
के रूप में जयप्रकाश ने नागरिकों के प्रत्याह्वान अर्थात्
है या समय के पूर्व ही अपने
प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार पर बल दिया है। उनके अनुसार, यदि निर्वाचक (जनता) ईमानदारी से ऐसा महसूस करते
हैं कि निर्वाचित प्रतिनिधि अयोग्य सावित हुआ चुनाव के समय किये गये वायदों को
पूरा करने के लिए सही ढंग से कार्य नहीं कर रहा है, तो इस सम्बन्ध में अगले चुनाव तक के लिए प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं
है। जनता का अलिखित अधिकार है कि वह प्रतिनिधियों से उनकी अकुशलता-अकर्मण्यता का
स्पष्टीकरण मांगे और स्पष्टीकरण सन्तोषजनक न होने पर उसे वापस बुलाने का अधिकार भी
जनता को है।
(2) सत्ता का विकेन्द्रीकरण (decentralization of power) —
सत्ता
का विकेन्द्रीकरण जयप्रकाश का सबसे प्रिय विषय है, जिस पर वे सदैव ही बल देते रहे हैं। जयप्रकाश का कथन है. “जब तक सत्ता का केन्द्रीकरण रहेगा, तानाशाही का खतरा बना रहेगा। " जयप्रकाश राजनीतिक सत्ता और आर्थिक सत्ता दोनों
के विकेन्द्रीकरण पर बल देते हैं और उनका यह निश्चित विचार है कि सत्ता के
विकेन्द्रीकरण से ही एक न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना सम्भव होगी। उन्होंने इस
बात पर बल दिया है कि अर्थव्यवस्था पूंजीपतियों और नौकरशाही, दोनों के नियन्त्रण से मुक्त होनी चाहिए।
(3) अनीति और अन्याय (iniquity and injustice)
के विरुद्ध संघर्ष और न्यायपूर्ण व्यवस्था की
स्थापना – जयप्रकाश का कहना है कि समग्र क्रान्ति के लिए हमें प्रत्येक स्तर पर
अनीति और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना होगा। विभिन्न क्षेत्रों में इसके लिए
क्या करना होगा, इस पर प्रकाश डालते हुए वे लिखते हैं,
“सीलिंग तथा भूमि के प्रगतिशील कानूनों पर अमल,
अनुचित बेदखली पर रोक, भूमिहीनों के लिए खेती लायक भूमि का प्रबन्ध, खेती की वैज्ञानिक व्यवस्था, मजदूरों
को उचित मजदूरी, घर पर उद्योग मुनाफाखोरी और सूदखोरी
पर नियन्त्रण, गांव के लिए आवश्यक अनाज का गांव में
संग्रह और अनाज की उचित मूल्य पर बिक्री, हर
बच्चे-बच्ची को उत्पादक शिक्षा, बीमार
का इलाज, झगड़ों का आपसी निपटारा, छुआछूत, तिलक,
दहेज और ऊँच-नीच के भेदभाव का अन्त, आदिवासी, हरिजन,
मुसलमान और नारी वर्ग के साथ समान और सम्मानपूर्ण
व्यवहार, आदि ।"
(4) लोकशक्ति को जाग्रत करने की आवश्यकता (need to awaken people's power)—
समग्र क्रान्ति के सन्दर्भ में जयप्रकाश सबसे
अधिक लोक शक्ति को जाग्रत करने की आवश्यकता पर बल देते हैं। जयप्रकाश की बड़ी
आकांक्षा थी कि यह विशाल भारतीय जो सदियों से सोया पड़ा है, एक आधुनिक और न्यायपूर्ण लोकतान्त्रिक समाज में परिणत हो जाय। 'आधुनिक और न्यायपूर्ण लोकतान्त्रिक समाज' भारतीय समाज के लिए उपयुक्त लक्ष्य है, इस बात को तो सभी स्वीकार करते हैं, लेकिन इस लक्ष्य को प्राप्त करने के साधनों पर
विचार भेद है। कुछ व्यक्तियों का विचार है कि सत्ता के आधार पर ही इस लक्ष्य को
प्राप्त करने का कार्य किया जा सकता है, व्यक्तियों
द्वारा इस प्रसंग में राजनीतिक दलों की भूमिका पर बहुत अधिक बल दिया गया है।
जयप्रकाश ने इस विचार को अस्वीकार किया कि समाज में वांछित परिवर्तन लाने और एक
न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना का कार्य सत्ता के माध्यम से किया जा सकता है।
सत्ता की भूमिका सीमित होती है और दूरगामी परिवर्तन लाने का कार्य सत्ता के माध्यम
से सम्भव नहीं है। उन्होंने इस मत का भी समर्थन नहीं किया कि राजनीतिक दल इस
भूमिका का निर्वाह ठीक प्रकार से कर सकते हैं, क्योंकि राजनीतिक दलों को तो सत्ता संघर्ष, सत्ता प्राप्ति और सत्ता भोगने में ही सर्वाधिक आकर्षण और आनन्द की
अनुभूति होती है। जयप्रकाश राजनीतिक दलों द्वारा समय-समय पर संचालित प्रतिरोध
आन्दोलनों से भी सन्तुष्ट नहीं थे।
अतः उन्होंने इस विचार का प्रतिपादन
किया कि राष्ट्रीय पुनर्संरचना के लिए स्वयंसेवकों की एक विशाल सेना की आवश्यकता
है। ये स्वयंसेवक अपने दुराग्रहों का त्याग करें और परस्पर सहयोग के आधार पर
सहकार्य करें। ये स्वयंसेवक जनता के बीच जाकर, उन्हीं के बीच रहकर, धैर्यपूर्वक
उन्हें उनकी समस्याओं के समाधान के लिए शिक्षा और प्रेरणा दें। इस सम्बन्ध में
जयप्रकाश की विचारधारा गांधीजी से अनुप्रेरित है ॥ गांधीजी हर गांव के लिए
कम-से-कम एक लोक सेवक अर्थात् भारत के लिए 6 लाख लोकसेवक चाहते थे जयप्रकाश तीव्र वेदना के साथ पूछते हैं,
“क्या हमारी 60 करोड़ की जनसंख्या में 6 लाख
देशभक्त स्वयंसेवक नहीं मिलेंगे? क्या
हमारे देश में युग की चुनौती को स्वीकार कर, देश के लिए अपनी सेवाएं समर्पित करने वाले पर्याप्त युवक-युवतियां
नहीं हैं।""
जयप्रकाश ऐसे समर्पित कार्यकर्ताओं
की आवश्यकता बड़ी तीव्रता से अनुभव करते थे और उनका विचार था कि इसके बिना कोई भी
योजना सफल होने वाली नहीं है। वेतन भोगी सरकारी कर्मचारियों से इस बात की आशा नहीं
की जा सकती। जयप्रकाश भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था और प्रक्रिया के सुचारु
संचालन के लिए भी ऐसा जन जागरण अभियान चाहते थे जिसके द्वारा उचित प्रकार के लोग
जनप्रतिनिधि
जायें, भ्रष्ट लोगों को जनता जनार्दन के दरबार में प्रस्तुत होना पड़े और एक
चुनाव से दूसरे चुनाव तक लोकतन्त्रीय प्रणाली ठीक प्रकार से चलती रहे। इस प्रकार
जयप्रकाश का दृढ़ विश्वास था कि न तो राजकीय सत्ता और न ही विभिन्न राजनीतिक दल
समाज में आधारभूत परिवर्तन ला सकते हैं, यह कार्य
तो समर्पित कार्यकर्ताओं की संगठित कार्यशक्ति से ही सम्भव है। जयप्रकाश इस प्रसंग
में छात्र वर्ग की निष्ठा और शक्ति पर बहुत अधिक विश्वास व्यक्त करते हुए छात्र
वर्ग को प्रमुख भूमिका प्रदान करते हैं। उन्होंने बड़े मनोयोग से यह समझाने का
प्रयत्न किया है कि “यह
क्रान्ति शान्तिपूर्वक लानी है और समाज की लोकतान्त्रिक व्यवस्था एवं जीवन पद्धति
को हानि पहुंचाये बिना लानी है।”
जयप्रकाश नारायण : मूल्यांकन (Jayaprakash Narayan: Evaluation)
आलोचकों ने जयप्रकाश के समस्त चिन्तन
में एक कमी बतलायी है। उनके अनुसार, जे.
पी. के विचार प्रेरणादायी होते हुए भी व्यावहारिक नहीं कहे जा सकते। उनकी समग्र
क्रान्ति, दलविहीन लोकतन्त्र की धारणा, लोकशक्ति में विश्वास, आदि आदर्श की दृष्टि से श्रेष्ठ हैं, लेकिन व्यवहार में इन स्थितियों को कभी प्राप्त किया जा सकेगा,
इसमें निश्चित रूप से सन्देह है। आलोचकों के
अनुसार, जनता द्वारा अपने प्रतिनिधियों को
वापस बुलाने का अधिकार तो ऐसा आदर्श है जो व्यवहार में लोकतन्त्र को आघात पहुंचा
सकता है। आलोचकों की इन टिप्पणियों में आंशिक सत्य अवश्य है।
लेकिन स्थिति का एक अन्य पक्ष यह है
कि यदि राजनीतिक चिन्तन में ही आदर्श के तत्व नहीं होंगे, तो हम राजनीतिक प्रेरणा के लिए कहां देखेंगे ? राजनीतिक चिन्तन के क्षेत्र में जयप्रकाश का निश्चित रूप से
महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने भारत में समाजवादी आन्दोलन को नवीन दिशा प्रदान की
है। उन्होंने इस बात का प्रतिपादन किया कि समाजवाद की मूल आस्था के तत्व प्रारम्भ
से ही भारतीय संस्कृति में विद्यमान हैं और भारत के द्वारा अपनी परिस्थितियों के
अनुरूप समाजवाद के स्वरूप को अपनाया जा सकता है। गांधीजी ने उन्हें समाजवादी दर्शन
का अधिकारी विद्वान बतलाया था और प्रो. विमल प्रसाद उन्हें भारतीय समाजवादी दर्शन
के 'मानस पिता' की संज्ञा देते हैं। डॉ. आर. ए. प्रसाद के अनुसार, “जे. पी. ने भारत में समाजवादी विचारों के प्रचार
में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।"
द्वितीय, जयप्रकाश के सामुदायिक लोकनीति के आदर्श ने ऐसे लोकतन्त्र का मार्ग
प्रशस्त किया है, जिसमें राजनीतिक दलों के अहं,
स्वार्थ-साधन और अवसरवादिता के लिए कोई स्थान
नहीं है। वे राजनीति को लोकनीति में परिवर्तित करना चाहते थे, ताकि राज्य शोषण का प्रतीक न रहकर सेवा का प्रतीक
बन जाय। उनका लक्ष्य लोकतान्त्रिक व्यवस्था में 'जनता की सहभागिता' को
बढ़ाना था और उन्होंने इस प्रसंग में जनशिक्षा और जन चेतना पर बहुत अधिक जोर दिया।
जे. पी. के विचारों का मूल्यांकन करते प्रो. हुए विमल प्रसाद लिखते हैं, “उन्हें भारत में पैदा हुए राजनीतिक चिन्तकों में
महानतम की संज्ञा दी जानी चाहिए। उन्होंने 25 वर्षों तक भारतीय समाजवादी आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान किया और उनके
विचारों की अपील किसी भी सूरत में भारत तक सीमित नहीं है।”
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