शक्ति का बल, प्रभाव और सत्ता से भेद (DISTINCTION OF POWER WITH FORCE, INFLUENCE AND AUTHORITY )

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 शक्ति का बल, प्रभाव और सत्ता से भेद

(DISTINCTION OF POWER WITH FORCE, INFLUENCE AND AUTHORITY )

शक्ति का बल, प्रभाव और सत्ता से भेद   (DISTINCTION OF POWER WITH FORCE, INFLUENCE AND AUTHORITY )
शक्ति और बल (Power and Force)

सामान्यतया शक्ति और बल को एक ही समझ लिया जाता है, किन्तु वास्तव में इन दोनों में अन्तर है। शक्ति बल का पर्याय नहीं है, क्योंकि शक्ति प्रच्छन्न बल है और बल प्रकट शक्ति। शक्ति की पृष्ठभूमि में बल रह सकता है, किन्तु वह बिल्कुल अलग है। शक्ति अप्रकट तत्व है, बल प्रकट तत्व है। बल का अर्थ है शास्तियों (Sanctions) की प्रयुक्ति या प्रतिबन्धों की व्यवस्था, जिसमें साधारण जुर्माने से लेकर प्राणदण्ड तक शामिल है। इस दृष्टि से शक्ति एक मनोभाव अथवा पूर्ण क्षमता है जो कि बल को सम्भव बनाती है।

रॉबर्ट बायर्सटेड के अनुसार, “शक्ति बल प्रयोग की योग्यता है न कि उसका वास्तविक प्रयोग।” वास्तव में, बल शक्ति का एक रूप है, किन्तु बल ही शक्ति नहीं है। बायर्सटेड ने शक्ति के तीन रूप बताये हैं : बल, प्रभाव तथा प्रभुत्व। बल शक्ति के दामन में उसी प्रकार रहता है, जैसे बादल में बिजली रहती है। जब बल अमर्यादित तथा लक्ष्यहीन होता है, तब उसे दमन कहा जाता है। स्वीकृत, सीमित तथा नियन्त्रित बल को शास्तियाँ कहा जाता है, इस प्रकार शक्ति बल की तुलना में निश्चित रूप से एक व्यापक तत्व है।

राजनीतिक शक्ति एवं सैनिक शक्ति में अन्तर (Distinction between Political Power and Military Power)—

यद्यपि राजनीतिक शक्ति और सैनिक शक्ति दोनों व्यापक दृष्टिकोण से शक्ति के ही प्रकार हैं, किन्तु इन्हें एक ही नहीं समझ लिया जाना चाहिए। राजनीतिक शक्ति एक जटिल शब्द है जिसमें सदैव ही शक्ति के अन्य रूप भी सम्मिलित होते हैं जैसे धन, शस्त्र-सामग्री, नागरिक सत्ता, मत पर प्रभाव, आदि। सैनिक शक्ति एक स्पष्ट तत्व है जो सैन्य बल पर आधारित होता है। राजनीति में सैनिक शक्ति का स्थान अत्यन्त गौण रहता है क्योंकि शक्ति वास्तविक बल प्रयोग नहीं, वरन् बल प्रयोग की क्षमता है। मोर्गेन्थो ने राजनीतिक शक्ति को मनोवैज्ञानिक शक्ति माना है जिसके अनुसार मनुष्य दूसरे मनुष्यों की क्रियाओं तथा मस्तिष्कों पर नियन्त्रण रखता है। सैनिक शक्ति दमन का वास्तविक प्रयोग है। जब हिंसा या दमन का वास्तविक प्रयोग किया जाता है तो उसका अर्थ है कि सैनिक या अर्द्ध-सैनिक शक्ति के पक्ष में राजनीतिक शक्ति ने अधित्याग (addiction) कर दिया है, किन्तु डायक सैनिक शक्ति को भी राजनीतिक शक्ति के अन्तर्गत रखने के पक्ष में है। उसके अनुसार संघर्ष राजनीति का मूल सार है चाहे वह शब्दों द्वारा या हिंसा द्वारा किया जाय। इस दृष्टि से सैनिक शक्ति को राजनीतिक शक्ति का एक उप-विभाग समझा जाना चाहिए। फिर भी सैनिक शक्ति राजनीतिक शक्ति की पृष्ठभूमि में ही रहती है। शस्त्रों, हिंसा या दमन द्वारा स्थापित सुव्यवस्था वस्तु नहीं आदिम-कालीन समाज की प्रतीक है जो किसी भी सभ्य राजनीतिक समाज के लिए प्रतिष्ठा की हो सकती है। राजनीतिक शक्ति मनोवैज्ञानिक प्रभाव, नेतृत्व तथा स्वेच्छा जैसे तत्वों पर आधारित हो सकती है।

शक्ति एवं प्रभाव (Power and Influence)



समानताएँ(Similarities) शक्ति और प्रभाव, यदि कुछ आधारों पर एक-दूसरे के समान हैं तो दूसरी ओर इनमें महत्वपूर्ण असमानताएँ भी हैं। ब्रचाश और बारात (Brachach and Barat) ने अपनी पुस्तक 'Political Power' में इन दोनों में अनेक असमानताएँ बतायी हैं। इन लेखकों के अनुसार शक्ति एवं प्रभाव, दोनों ही बौद्धिक एवं सम्बन्धात्मक हैं तथा एक-दूसरे को सबलता प्रदान करते हैं। दोनों औचित्यपूर्ण हो जाने के पश्चात् ही प्रभावशाली होते हैं। प्रभाव शक्ति उत्पन्न करता है तथा शक्ति प्रभाव को। दोनों को एक-दूसरे की आवश्यकता पड़ती है। शक्ति और प्रभाव अलग-अलग व्यक्ति में हो सकते हैं और शक्ति तथा प्रभाव दोनों के दर्शन एक ही व्यक्ति में किये जा सकते हैं। शक्ति एवं प्रभाव दोनों प्रभावित व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करते हैं, किन्तु वह व्यक्ति शक्ति के कारण परिवर्तित हुआ या प्रभाव के कारण, यह मालूम करना कठिन होता है। इसका निर्णय तो वास्तव में स्वयं वही कर सकता है। ये दोनों एक-दूसरे के लिए वर्द्धनकारी भी हो सकते हैं।

  (1) असमानताएँ(Inequalities) शक्ति और प्रभाव एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हुए भी इनमें महत्वपूर्ण भेद हैं :

(1    शक्ति दमनात्मक होती है(Power is oppressive ) और उसके पीछे कठोर भौतिक बल एवं प्रतिबन्धों का प्रयोग होता है। जब शक्ति का प्रयोग किया जाता है तो शक्ति से प्रभावित होने वाले व्यक्ति या समूह के पास उसे स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता। प्रभाव अनुनयात्मक, स्वेच्छापूर्ण तथा मनोवैज्ञानिक होता है।

प्रभावित होने वाले व्यक्ति या समूह के पास सदैव उसके अनुपालन के विषय में अनेक विकल्प मौजूद रहते हैं।

(2) शक्ति प्रायः (Power is often) शक्तिधारक के पास एक स्वतन्त्र तत्व के रूप में रहती है। उसका प्रयोग शक्तिधारक दूसरों की इच्छा के विरुद्ध एवं प्रतिरोध के रहते हुए कर सकता है। प्रभाव सम्बन्धात्मक होता है और उसकी सफलता का आधार प्रभावित व्यक्ति की सहमति या स्वीकृति होती है अर्थात् प्रभाव प्रभावित व्यक्ति की स्वेच्छा पर निर्भर होता है।

(3) शक्ति को अप्रजातन्त्रात्मक माना जाता है।(Power is considered undemocratic.) वह प्रति-शक्ति (counter-power) को आमन्त्रित करती है तथा भय पर आधारित होती है। इसके विरुद्ध प्रभाव पूर्णतया प्रजातन्त्रात्मक माना जाता है। उसका अनुपालन स्वेच्छा से किया जाता है। 'प्रभाव' का प्रभाव विचार की समानताओं और मूल्यों की समरूपता के कारण होता है।

(4) शक्ति और शक्ति के प्रयोग पर अनेक सीमाएँ लगी होती हैं। (There are many limitations on the use of power and power.)शक्ति कितनी भी अधिक क्यों न हो, उसे किसी-न-किसी तरह के प्रभाव के सहारे की आवश्यकता पड़ती है अन्यथा शक्ति के दुर्बल होते ही या प्रतिबन्धों के अभाव में उसका अनुपालन नहीं किया जायगा। प्रभाव की शक्ति असीम होती है और प्रभाव प्राप्त कर लेने पर उसका खुलकर लाभ उठाया जा सकता है क्योंकि प्रभावक और प्रभावित के बीच एक सद्भावनापूर्ण सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। सच्चे रूप में प्रभाव प्राप्त हो जाने पर शक्ति अनावश्यक हो जाती है।

(5) शक्ति को सभ्यता एवं संस्कृति के बाहरी तत्व के रूप में समझा जाना चाहिए।(Power should be understood as an external element of civilization and culture.)  उसका प्रयोग निश्चित, सीमित और विशिष्ट रूप से ही किया जा सकता है। उसके प्रयोगकर्ता का स्वरूप प्रायः सुनिश्चित होता है जबकि प्रभाव प्रायः व्यक्तिगत, अमूर्त तथा अस्पष्ट होता है।

कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनमें शक्ति और प्रभाव एक-दूसरे से पूर्णतया पृथक् रहते हैं। एक व्यक्ति शक्ति रखते हुए भी प्रभावहीन हो सकता है। उदाहरण के लिए, 25 मार्च, 1971 से 16 दिसम्बर, 1971 तक याह्या खाँ की पूर्वी बंगाल के सम्बन्ध में यही स्थिति थी। उन्हें पूर्वी बंगाल के सम्बन्ध में केवल शक्ति प्राप्त थी. प्रभाव नहीं। दूसरी ओर शेख मुजीबुर्रहमान को दिसम्बर 1971 के पूर्व पूर्वी बंगाल के सम्बन्ध में प्रभाव ही प्राप्त था, शक्ति या सत्ता नहीं। अतः प्रभाव को शक्ति की आवश्यकता नहीं पड़ती और शक्ति भी बिना प्रभाव के रह सकती है, लेकिन यह स्थिति साधारणतया लम्बे समय तक नहीं रहती । शेख मुजीब जिन्हें 16 दिसम्बर, 1971 के पूर्व केवल प्रभाव प्राप्त था, उन्होंने दिसम्बर 1971 में बंगलादेश के सम्बन्ध में शक्ति भी प्राप्त कर ली। शक्ति और सत्ता (Power and Authority)

राजनीतिक संगठन उन संरचनाओं द्वारा निर्मित होते हैं जो कि बल के प्रयोग का नियमन करती हैं तथा सामाजिक सहयोग और नेतृत्व से सम्बन्धित होती हैं। इनमें शक्ति और सत्ता का महत्वपूर्ण स्थान होता है। शक्ति व्यक्तियों, समूहों तथा भौतिक परिस्थितियों के प्रतिरोध के होते हुए भी स्वतन्त्र कार्य करने की क्षमता का नाम है। यह आदेश देने की क्षमता है। उसे अपनी इच्छा को प्रभावशाली ढंग से पूर्ण करने की योग्यता के रूप में देखा जा सकता है और यदि आवश्यकता पड़े तो दूसरों पर थोपा जा सकता है। इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जिनमें दूसरे राज्यों पर अनधिकृत रूप से अधिकार किया गया अथवा उन पर विजय प्राप्त की गयी, किन्तु बाद में धीरे-धीरे उन्हें जनस्वीकृति प्राप्त हो गयी और वे सत्ता बन गये। सत्ता के बिना शक्ति असंस्थायीकृत, असाधनात्मक, परिस्थितिजन्य एवं अनिश्चित होती है। सत्ता संस्थायीकृत होने के कारण अपने विषय-क्षेत्र और प्रकृति से निश्चित होती है, उसके निर्देशों को बाध्यकारी मानकर पालन किया जाता है। सत्ता निश्चित, स्पष्ट तथा प्रकट होती है। इसलिए उसका विभिन्न स्तरों पर व्यक्तियों, संस्थाओं अथवा समूहों में प्रत्यायोजन किया जा सकता है। शक्ति में इस प्रकार की स्पष्टता एवं निश्चितता का अभाव होता है।

चार्ल्स ई. मेरियम ने 'Political Power' में शक्ति और सत्ता में कोई भेद नहीं किया है. लेकिन वास्तव में इस प्रकार का दृष्टिकोण उचित नहीं है। शक्ति दमन का एक यन्त्र है और इसका प्रभाव भौतिक होता है। सत्ता सहमति पर आधारित हो सकती है और इसके साथ ही अधिक प्रभावदायक हो सकती है। अनेक राजनीतिक और सामाजिक संस्थाएँ ऐसी हैं जोकि बहुत अधिक सत्ता का प्रयोग करती हैं, किन्तु केवल सहमति पर आधारित हैं। शिक्षक, पत्रकार, और जनसेवक की सत्ता शक्ति पर आधारित नहीं होती, फिर भी उसका बहुत अधिक सम्मान किया जाता है।

राजनीतिक व्यवस्थाओं और संगठनों में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि वरिष्ठ व्यक्ति के पास केवल सत्ता है और अधीनस्थ या कनिष्ठ व्यक्तियों के पास शक्ति, लेकिन यह अवांछित स्थिति ही है। इन दोनों का उचित सन्तुलन राजनीति की एक शाश्वत समस्या है, जिसे सफल नेतृत्व के द्वारा ही सुलझाया जा सकता है। राजनीतिक व्यवस्था और संगठनों में सत्ता और शक्ति को सामान्य रूप से संयुक्त किया जाता है और ऐसा किया जाना आवश्यक है क्योंकि अत्यन्त लोकप्रिय शासक को भी शासन सत्ता के संचालन के लिए सत्ता और शक्ति दोनों की आवश्यकता होती है।

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It is better to read one book for ten times, than to read ten books for time.”

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