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यह
विचारधारा कानून की अवधारणा के विकास सम्बन्धी पहलू के अध्ययन पर बल देते हुए
महत्वपूर्ण सेवा सम्पादित करती है। विश्लेषणवादी विचारधारा द्वारा प्रतिपादित
कानून की औपचारिक और स्थिर धारणा पर यह एक आवश्यक और उचित सुधार है। गैटल ठीक ही
लिखते हैं, "यह विचारधारा वैधानिक विश्लेषण के
लिए पृष्ठभूमि प्रदान करती है और बतलाती है कि कानूनी व्यवस्थाएं निरन्तर
परिवर्तित होती रहती हैं तथा नवीन स्थितियों का सामना करने के लिए उनमें परिवर्तन
होने ही चाहिए।'
यह
पद्धति विभिन्न राष्ट्रों की कानूनी पद्धतियों के अध्ययन हेतु अधिक उपयुक्त है, परन्तु इस पद्धति की यह बड़ी कमी है कि इसके पोषक साधारणतया
कानून में परिवर्तन के विरोधी होते हैं। वे कानूनी इतिहास पर आवश्यकता से अधिक बल
देते हैं। अतीत के प्रति अधिक श्रद्धा होने के कारण यह विचारधारा रूढ़िवादी है।
इसके अतिरिक्त इस पद्धति में विधि के दर्शन को उचित स्थान नहीं दिया जाता। इस
प्रकार यह विचारधारा प्रथाओं और परम्पराओं के अतिरिक्त अन्य तत्वों की अवहेलना
करती है और कानून के सम्बन्ध में पूर्ण सत्य को व्यक्त नहीं करती।
दार्शनिक विचारधारा (Philosophical
School)—इस विचारधारा के प्रतिपादक न्यायविद्
वर्तमान या अतीत के वास्तविक कानूनों की अपेक्षा कानून के अमूर्त अथवा दार्शनिक
रूप का अध्ययन करते हैं। उनका विशेष सम्बन्ध न्याय के विचार का एक नैतिक सिद्धान्त
के रूप के विकास और विकास और एक आदर्श न्याय पद्धति से है। इस पद्धति में कानून के
विकास के विचार को आचारात्मक और नैतिक तत्व के रूप में देखा जाता है। इसके पोषकों में हीगल, काण्ट और डीन पाउण्ड का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है।
जर्मनी के प्रोफेसर जोसेफ कोहलर इस विचारधारा के सबसे प्रमुख आधुनिक प्रतिपादक
हैं। कोहलर (Kohler) के अनुसार, “न्याय के दार्शनिक पहलू का
आदर्श से उतना ही सम्बन्ध है जितना कि कानून के यथार्थ तत्वों से । कानून संस्कृति
की उपज और उसे आगे बढ़ाने का साधन दोनों ही है।" इस विचारधारा के न्यायविद् कानून के अमूर्त "अथवा दार्शनिक रूप पर अधिक बल देते
हैं। इस पद्धति का मुख्य दोष यह है कि ये विचारक
कानूनों
से सम्बन्धित दार्शनिक विवेचनों में अधिक संलग्न रहते हैं और यथार्थ को दृष्टि में
नहीं रखते ।
तुलनात्मक विचारधारा (Comparative School) – यह अपेक्षाकृत नयी विचारधारा
है और एक अर्थ में ऐतिहासिक विचारधारा से श्रेष्ठ है। इसमें विभिन्न देशों की
कानूनी पद्धतियों पर विचार करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं। वास्तव में, यह ऐतिहासिक पद्धति का ही एक विकसित और परिवर्तित रूप है
क्योंकि इसके प्रतिपादकों का यह विश्वास है कि विभिन्न कानूनी पद्धतियों और
प्रथाओं—अतीत और वर्तमान — सभी की समीक्षा और तुलना करने से वे अधिक अच्छे कानून
सम्बन्धी निष्कर्षो पर पहुंच सकते हैं। इसके पोषकों में हर्बर्ट स्पेंसर और मार्शल
मुख्य हैं और मेन व पोलक ने भी इसे कुछ सीमा तक अपनाया है।
समाजशास्त्रीय विचारधारा (Sociological School) — इस विचारधारा के प्रतिपादकों
का विश्वास है कि कानून सामाजिक शक्तियों की उपज होते हैं, अतएव उसे समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन होना चाहिए।
वे कानून के प्रशासन व उसकी रचना के ढंग दोनों ही बातों पर ध्यान देते हैं और उनका
विश्वास है कि कानून की अच्छाई का निर्णय उसके परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि आदर्श व काल्पनिक सिद्धान्तों पर। वे कानून के सामाजिक
उद्देश्यों का अध्ययन करते हैं और उसका अन्य सामाजिक शास्त्रों व सिद्धान्तों से
भी सम्बन्ध स्थापित करते हैं। इसी कारण वे मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और व्यवहारवाद (Pragmatism)
के आधुनिक
विकास से काफी अध्ययन सामग्री लेते हैं। इस शाखा के विचारकों में आस्ट्रिया के
गमप्लाविज, हालैण्ड के क्रैव और संयुक्त राज्य
अमरीका के जस्टिस होल्म्स प्रमुख हैं । इंगलैण्ड के प्रसिद्ध विचारक हैरल्ड लास्की
भी इस विचारधारा के समर्थक हैं ।
समाजशास्त्रीय
विचारधारा कानूनों की अच्छाई-बुराई
का निर्णय उसके परिणामों के आधार पर करती है,
दार्शनिक
सिद्धान्तों से नहीं। उनके अनुसार कानून का स्रोत राज्य नहीं, राज्य तो केवल उन सामाजिक नियमों को, जो अपने आप समाज हित में विकसित हैं, कानूनी स्वरूप दे देता है। इस दृष्टि से कानून का अस्तित्व
राज्य के पूर्व माना जाता है और कानून की सत्ता राज्य से बढ़कर है। उदाहरण के लिए, डिग्विट के अनुसार, “कानून आचरण के वे नियम हैं
जो मनुष्यों को समाज में नियन्त्रित रखते हैं। मनुष्यों में सामाजिक संगठन की
आवश्यकता की स्वाभाविक चेतना होती है जिसके कारण वे नियमों का पालन करते हैं। अतएव
कानून राज्य से स्वतन्त्र, पूर्वकालिक, ऊपर और अधिक व्यापक है।" इस प्रकार यह विचारधारा राज्य की सम्प्रभुता पर नहीं, वरन् कानून की सम्प्रभुता पर बल देती है।
कानून
की समाजशास्त्रीय विचारधारा निम्न प्रकार से दोषपूर्ण है :
(i) चलन पूर्व राजनीतिक हो सकता है, किन्तु
कानून नहीं । राज्य कानून के लिए संगठित होता है।
(ii) यह कथन असत्य है कि कानून
सम्प्रभु की आज्ञा नहीं होता, क्योंकि कानून की पीछे
आध्यात्मिक शक्ति होती है।
(iii) सभी कानून सामाजिक हित में ही हों ऐसा होना जरूरी नहीं है ।
(iv) कानून राज्य से स्वतन्त्र (INDEPENDENT OF RULE OF LAW)नहीं हो सकता।
निष्कर्ष—उपर्युक्त
विचारधाराओं में से कोई भी कानून के स्वरूप पर पूर्ण प्रकाश डालने में असमर्थ है, किन्तु इसके साथ ही इनमें से प्रत्येक में सत्य का कुछ न कुछ
अंश अवश्य है। कानून एक निश्चित तथा उच्चतर मानव का आदेश मात्र नहीं होता और न इसे
स्थिर और मानव जीवन की आवश्यकताओं से अलग ही
माना जा सकता है। कानून की एक उचित धारणा के अन्तर्गत हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा
कि राजनीतिक शासन की सत्ता कानून को वैधानिक मान्यता प्रदान करती है, परन्तु उसका यथार्थ स्वरूप देश के ऐतिहासिक वातावरण तथा समाज
की नैतिकता का परिणाम होता है। कानून प्रगतिशील होता है और अपने आपको जनता के
नैतिक, आर्थिक तथा धार्मिक दृष्टिकोण के
अनुकूल बना लेता है। आजकल सभी विचारधाराओं के विधानशास्त्री कानून को मानव कल्याण
का एक साधन मानने लगे हैं। आज के विधानशास्त्री कानून की केवल सैद्धान्तिक विवेचना
ही नहीं करते वरन् वे यह भी देखते हैं कि अतीत में उन कानूनों का क्या प्रभाव हुआ
है, उनकी वर्तमान स्थिति क्या है और
मानवीय प्रयत्न से उन्हें किस प्रकार सुधारा जा सकता है।
कानून
अनिवार्य अवश्य होता है और उसे क्रियान्वित करने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जा
सकता है। यही कानून की सबसे बड़ी विशेषता है। परन्तु वास्तव में, कानून के पालन का मुख्य कारण उसकी अनिवार्यता नहीं है, वरन् लोग कानून का पालन स्वेच्छा से ही करते हैं। इस सम्बन्ध
में मैकाइवर नितान्त उचित रूप में लिखते हैं कि "कानून के पालन का मूल कारण
दमन नहीं, वरन् कानून के पालन की इच्छा
होती है फिर भी कानून आदेश की स्थिति को प्राप्त कर लेता है।""
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