कानून का स्वरूप(FORM OF LAW)
कानून के वास्तविक स्वरूप के सम्बन्ध में राजनीतिक विचारकों में मतभेद है। कुछ विचारक कानून पर विश्लेषणात्मक दृष्टि से विचार करते हैं, तो कुछ ऐतिहासिक, दार्शनिक, तुलनात्मक या समाज-वैज्ञानिक दृष्टि से उसकी विवेचना करते हैं। इस सम्बन्ध में प्रमुख रूप से निम्न विचारधाराओं का अध्ययन आवश्यक है :
विश्लेषणात्मक
विचारधारा या कानूनी विचारधारा (The Analytical School or
the Legalistic School) — कानून के विश्लेषणवादी
सम्प्रदाय ने निरंकुशतावादी और आदर्शवादी दर्शन से प्रेरणा ग्रहण की है, जिसका प्रारम्भ प्लेटो से समझा जा सकता है। कानून के सम्बन्ध
में इनकी धारणा बेन्थम और आस्टिन के विचारों पर आधारित है और इसके प्रतिपादन का
कार्य हालैण्ड और विलोबी, आदि के द्वारा किया गया है।
ये विचारक कानून को राज्य की असीम सम्प्रभुता का निश्चित और स्पष्ट आदेश मानते हैं
जिसका पालन राज्य की शक्ति के द्वारा ही कराया जाता है। इस प्रकार यह विचारधारा
कानून के स्रोत के रूप में व्यवस्थापन पर बल देती है।
आलोचना (CRITICISM)- यद्यपि विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण सीधा और सरल है, किन्तु इसकी कड़ी आलोचना की गयी है। सर्वप्रथम, विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण बहुत कठोर और आवश्यकता से अधिक
वैधानिक है। मैकाइवर के शब्दों में, "कानून
आदेश नहीं वरन् आदेश के बिल्कुल विपरीत है। कानून को आदेश मानने का परिणाम राज्यकार्य
में अव्यवस्था होता है।” कानून आदेश से इस रूप से
भिन्न है कि आदेश, आदेश देने वाले और प्राप्त करने वाले
को एक-दूसरे से पृथक करता है जबकि
कानून विधायक और सामान्य नागरिक दोनों पर समान रूप से लागू होता है। ऑस्टिन
का सम्प्रभु निरंकुश और कानून से उच्च है, लेकिन
आज के प्रजातान्त्रिक राज्य में इसे सत्य नहीं कहा जा सकता क्योंकि मन्त्रियों और
विधायकों को भी कानून के सम्मुख झुकना पड़ता है।" प्रो. लास्की भी कहते हैं, "कानून को केवल एक आदेश मानना न्यायज्ञ के लिए परिभाषा को
सौजन्य की सीमा तक खींचना है। कानून में एक प्रकार की एकरूपता होती है, जिसमें आदेश का तत्व आंखों से लगभग ओझल ही होता ब्राइस, फ्रेडरिक पोलक और सालमण्ड के द्वारा भी इसी प्रकार का
विचार व्यक्त किया गया है।
द्वितीय, 'आदेश' प्रशासन से सम्बन्धित होता है, व्यवस्थापन से नहीं । कानून में एक विशेष प्रकार का स्थायित्व
होता है जबकि 'आदेश' विशेष
परिस्थितियों के आधार पर जारी किए जाते हैं।
तृतीय, विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
अपर्याप्त और अधूरा है। यह उन सारे रिवाजों को जो समाज में प्राकृतिक रूप से विकसित
होते हैं और मान्य हैं, बिल्कुल अस्वीकार कर देता
है। इन नियमों को सर्वसत्ता के आदेशों से किसी भी प्रकार कम शक्ति प्राप्त नहीं
है। सर हेनरी मेन ने विश्लेषणवादी विचारधारा की इस कमी की ओर विशेष रूप से ध्यान
आकर्षित किया है। वस्तुतः कोई भी सम्प्रभु परम्परागत नियमों की अवहेलना का साहस
नही कर सकता। लास्की के अनुसार, टर्की के निरंकुश सुल्तान द्वारा भी परम्परागत सामाजिक नियमों
की अवहेलना का कभी कोई प्रयत्न नहीं किया गया।
चतुर्थ, इस दृष्टिकोण में रूढ़िवाद
की झलक दिखायी देती है। गैटल के कथनानुसार, “विश्लेषणात्मक शाखा के लेखक
नियमों को प्रगतिशील न मानकर गतिहीन मान लेते हैं और वे कानून के ऐतिहासिक विकास
की ओर ध्यान नहीं देते।” ऐसी स्थिति में कहा जा सकता
है कि विश्लेषणात्मक विचारधारा गर्दभ के समान है। उसे यह सुधि नहीं रहती कि समय
कितना बीत गया है और जमाना कहां चला गया है। उसकी स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता।
वह तो प्रगति विरोधी या प्रगति के प्रति उदासीन खूंटे से बंधा रहता है।
विश्लेषणवादी
विचारधारा की कमियों के बावजूद यह कहा जा सकता है कि स्पष्ट परिभाषाओं और तार्किक
निष्कर्षों पर विशेष बल देते हुए इस विचारधारा ने कानून की अवधारणा के सम्बन्ध में
अस्पष्टताओं सन्देहों और असंगतियों को दूर करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।
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