कानून के प्रकार (TYPE OF LAW)
विभिन्न
विद्वानों ने कानूनों का वर्गीकरण विभिन्न प्रकार से किया है। कुछ विद्वान कानून-निर्मात्री सत्ता तो कुछ अन्य के आधार पर वर्गीकरण
करते हैं, कुछ विद्वान निजी सार्वजनिक
विशेषताओं के आधार पर, विद्वान राष्ट्रीयता एवं
अन्तर्राष्ट्रीयता के आधार पर । कानून के विविध प्रकारों की अलग-अलग व्याख्या निम्न प्रकार से की जा सकती है :
(1) व्यक्तिगत कानून ( Private Laws) – ये कानून व्यक्तियों के
पारस्परिक सम्बन्धों को निश्चित करते हैं। उदाहरणस्वरूप, ऋण सम्बन्धी कानून और जायदाद खरीदने व बेचने के कानून इसी
श्रेणी में आते हैं।
(2) सार्वजनिक कानून (Public Laws ) — इन कानूनों द्वारा व्यक्ति
का सरकार या राज्य के साथ सम्बन्ध निश्चित किया जाता है। उदाहरणस्वरूप, कर लगाने, चोरी, डकैती और हत्या करने वालों को दण्ड देने के लिए जो कानून
बनाये जाते हैं, इन्हें इसी सूची में शामिल किया जाता
है।
(3) संवैधानिक कानून (Constitutional Laws)—संवैधानिक कानून उस कानून को कहते हैं जिसके द्वारा सरकार का
ढांचा निश्चित किया जाता है और जिसके द्वारा राज्य के प्रति नागरिकों के अधिकारों
तथा कर्तव्यों का विश्लेषण किया जाता है। उदाहरणस्वरूप, भारत में राष्ट्रपति का निर्वाचन, सर्वोच्च न्यायालय का गठन और शक्तियां तथा राज्यपाल की
नियुक्ति से सम्बन्धित कानून संवैधानिक कानून के ही उदाहरण हैं।
(4) सामान्य कानून (Ordinary Laws ) — नागरिकों के दैनिक जीवन एवं
आचरण को नियमित करने वाले कानूनों को सामान्य कानून कहते हैं। वे व्यवस्थापिका
द्वारा नियमित होते या रीति-रिवाजों
और परम्पराओं ही पर आधारित होते हैं। लचीले संविधान में तो सामान्य कानून और
संवैधानिक कानून के निर्माण की एक प्रक्रिया होती है, किन्तु कठोर संविधान में संवैधानिक कानून के निर्माण, परिवर्तन या संशोधन की प्रक्रिया सामान्य कानून से भिन्न तथा
विशेष प्रकार की होती है।
(5) प्रशासकीय कानून (Administrative Laws) — किसी-किसी देश में साधारण नागरिकों से पृथक् सरकारी कर्मचारियों के
लिए अलग कानून होते हैं। इन कानूनों को प्रशासकीय कानून कहते हैं। 'ये वे नियम हैं जो राज्य के सभी कर्मचारियों के अधिकारों तथा
कर्तव्यों को निश्चित करते हैं।' फ्रांस प्रशासकीय कानून का
सर्वोत्तम उदाहरण है।
(6) प्रथागत कानून (Common Laws)—ये देश में प्रचलित रीति-रिवाज और परम्पराओं का विकसित रूप होते हैं और न्यायालय
इन्हें मान्यता देकर कानून का रूप प्रदान करते हैं। इंगलैण्ड में कानून के विकास
में रीति-रिवाजों ने महत्वपूर्ण भाग
लिया है। इसलिए वहां 'कॉमन लॉ' काफी प्रचलित है।
(7) अध्यादेश (Oridinance ) — किसी विशेष परिस्थिति का
सामना करने के लिए अथवा किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए, कार्यपालिका के द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए जो आदेश जारी
किया जाता है, उसे अध्यादेश कहते हैं। भारत के
राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का अधिकार प्राप्त है।
(8) अन्तर्राष्ट्रीय कानून (International Laws) – कानून के उपर्युक्त सभी भेद
राष्ट्रीय कानून के ही उदाहरण है, किन्तु इनके अतिरिक्त भी एक
और कानून होता है। विश्व के स्वतन्त्र राष्ट्रों के पारस्परिक सम्बन्ध को नियमित
करने वाले कानूनों को अन्तर्राष्ट्रीय कानून कहते हैं। ओपनहेम (Oppenheim) के शब्दों में, "अन्तर्राष्ट्रीय विधि प्रयासों और परम्पराओं का वह समूह है जो
सभ्य राज्यों द्वारा अपने आपसी सम्बन्ध में कानूनी तौर पर बाध्य समझा जाता है।" वर्तमान समय तक अन्तर्राष्ट्रीय
कानून को, राष्ट्रीय कानून की भांति, बाध्यकारी शक्ति प्राप्त नहीं हुई है और इनके पीछे सबसे बड़ी
शक्ति अन्तर्राष्ट्रीय लोकमत की है।
कानून के
उद्गम या स्रोत
(SOURCES OF LAWS)
के स्रोत से तात्पर्य उन साधनों से है जो प्रत्यक्ष रूप से कानून के
निर्माण में सहायता देते हैं। आधुनिक
राज्यों
में सामान्यतः विधानमण्डल द्वारा कानून का निर्माण किया जाता है, किन्तु विधानमण्डल के अतिरिक्त
भी
कानून के अनेक स्रोत हैं, जिनका उल्लेख निम्न प्रकार से किया जा सकता है :
(1) रीति-रिवाज या परम्पराएं (Customs or Tradition) - रीति रिवाज कानून का
प्राचीनतम तथा एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। रीति-रिवाजों का निर्माण नहीं होता, वरन्
धीरे-धीरे उनका विकास होता है। ये
समाज के वे प्रचलित नियम होते हैं, जिन्हें समाज के सभी लोग
लम्बे समय से मानते चले आ रहे हैं। इन रीति-रिवाजों
के पीछे सामाजिक संगठन का नियन्त्रण तथा समाज का नैतिक बल रहता है। जब ये समाज में
अधिक मान्य तथा प्रचलित हो जाते हैं, तब राज्य उन्हें कानून का
रूप दे देता है। इस प्रकार समाज के प्रचलित रीति-रिवाज कानून का रूप धारण कर लेते हैं और उन्हें प्रथागत कानून
कहा जाने लगता है। रोम में, 'ट्वेल्व टेबुल्स' (Twelve Tables), भारत
में स्मृतियां तथा इंगलैण्ड में 'कामन लॉ' इसी स्रोत की देन हैं। एक राज्य की वैधानिक व्यवस्था में रीति-रिवाजों का महत्व स्पष्ट करते हुए मैकाइवर ने लिखा है
कि "कानून के विशाल ग्रन्थ में
राज्य केवल ही नये वाक्य लिखता है और कहीं-कहीं
एक आधा पुराना वाक्य काट देता है। इस ग्रन्थ के अधिकांश भागों की रचना में राज्य
का कभी कोई हाथ नहीं रहा है, परन्तु राज्य स्वयं इस
सम्पूर्ण ग्रन्थ से मर्यादित होता है।"
(2) धर्म (Religion)—कानून के विकास में परम्परा
की भांति धर्म का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है। धर्म पराम्परागत कानून को धार्मिक
विश्वास की मान्यता देकर उसे सबल बनाता है और इस दृष्टि से ये दोनों घनिष्ठ रूप
में सम्बन्धित हैं। इतना ही नहीं, धर्म ने प्रत्यक्ष रूप से भी
कानून को जन्म दिया है। प्राचीनकाल में ईश्वर को समस्त सत्ता और कानून का उद्गम माना
जाता था। इस प्रकार धर्माधिकारियों तथा धर्म शासकों के माध्यम से अभिव्यक्त
कानूनों का स्वरूप दैवी होता था। प्राचीन समाज में धर्म तथा कानून इतने घुले-मिले थे कि जीवन के सभी नियमों के पीछे धार्मिक
मान्यता का बल पाया जाता था । विल्सन ने ठीक ही कहा है कि "रोम का प्रारम्भिक कानून शास्त्रगत धार्मिक नियमों के
एक संग्रह अथवा कतिपय धार्मिक सिद्धान्तों के उचित पालन द्वारा धार्मिक अधिकार
प्राप्त करने के साधनों की एक व्यवस्था के अतिरिक्त और कुछ नहीं था । " आज भी हिन्दुओं का कानून मनु की
व्यवस्था के आधार पर और इस्लामी कानून शरीयत के आधार पर टिका हुआ है।
(3) न्यायिक निर्णय (Judicial Decisions)—जैसे-जैसे
सामाजिक व्यवस्था जटिल होने लगी, वैसे-वैसे विभिन्न रीति-रिवाजों
में संघर्ष उत्पन्न होने लगा और इस संघर्ष के कारण रीति-रिवाजों की वैधता में सन्देह किया जाने लगा। इसी स्थिति में
कभी-कभी ऐसे विवाद भी खड़े हो
जाते थे, जिनका रिवाजों के पास कोई समाधान
नहीं था, अतः ऐसे विवादों को सुलझाने के लिए
समाज के उन सबसे बुद्धिमान व्यक्ति अथवा व्यक्तियों की सलाह ली जाती थी, जिनका निर्णय सबको स्वीकार हो। ऐसे व्यक्तियों के निर्णयों ने
'कानूनी दृष्टान्तों (Precedents) का रूप धारण कर लिया। बाद में उत्पन्न विवाद सुलझाने के लिए
इन पूर्ण दृष्टान्तों का अनुकरण किया जाने लगा और इस प्रकार न्यायिक निर्णय कानून
के स्रोत बन गये ।
आज
भी न्यायिक निर्णय कानून के विकास में पर्याप्त
सहायक होते हैं। न्यायाधीश विधि की व्यवस्था करते समय जाने-अनजाने में नये कानून के निर्माण का कार्य करते हैं। संयुक्त
राज्य अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय ने तो अपनी व्याख्या की शक्ति द्वारा संविधान
में पर्याप्त परिवर्तन कर दिये हैं। जस्टिस होल्म्स (Holmes) के विचार में, “न्यायाधीश कानून बनाते हैं और उनको इसका अधिकार भी है। "
(4) कानूनी टीकाएं (Commentaries) प्रत्येक देश में कानून के प्रसिद्ध ज्ञाता कठिन कानूना के
अर्थ को स्पष्ट रूप से समझाने के लिए कानून की व्याख्या करते हुए ग्रन्थ-रचना करते
हैं, जिन्हें कानूनी टीकाएं कहा
जाता हैं। न्यायशास्त्रियों और विधि विशारदों की ये टीकाएं भी कानून का एक
महत्वपूर्ण स्रोत होती हैं। टीकाकार कानून के आधारभूत अमूर्त विद्वानों की विवेचना
करते हुए उनके यथार्थ स्वरूप पर प्रकाश डालते हैं तथा न्याय और कल्याण की दृष्टि
से संशोधनों के सुझाव प्रस्तुत करते हैं। न्यायालयों में न्यायाधीश इन टीकाओं को
मान्यता देते हैं तथा अपने निर्णयों में इनका आदर के साथ उल्लेख करते हैं। इस
प्रकार कानून की ये शास्त्रीय टीकाएं कानून के विकास में सहायक होती हैं। इंगलैण्ड
में सर एडवर्ड कोक, ब्लैकस्टोन और डायसी, आदि महान् टीकाकारों की व्याख्याओं ने कानून का बहुत कुछ
संशोधन किया है। इसी प्रकार हिन्दुओं में मिताक्षरा अथवा दायभाग
और मुसलमानों में 'फतवा आलमगीरी' भी इस प्रभाव के उल्लेखनीय उदाहरण हैं।
(5) साम्य नीति या औचित्य (Equity)—औचित्य भी एक अन्य स्रोत है जिससे कानून का उद्भव हुआ है। न्यायाधीशों के
समक्ष कभी-कभी ऐसे विवाद उपस्थित हो
जाते हैं जिनके सम्बन्ध में कानून कोई प्रकाश नहीं डालता। ऐसी स्थिति में
न्यायाधीश विवेक, न्यायशास्त्र के अनुभव और न्याय की
साधारण मान्यताओं के आधार पर निर्णय देते हैं और ये निर्णय ही औचित्यपूर्ण निर्णय
कहलाते हैं। इस सम्बन्ध में न्यायाधीशों के निर्णय (Adjudications) और औचित्यपूर्ण
निर्णय (Equity) में भेद कर लेना आवश्यक है।
न्यायाधीशों के निर्णय का तात्पर्य उन निर्णयों से होता है, जिन्हें न्यायाधीश वर्तमान कानूनों की व्याख्या करते समय अथवा
उन पर व्यवस्था करते समय घोषित करते हैं, किन्तु औचित्यपूर्ण निर्णय
न्यायाधीश अपने विवेक के आधार पर उस समय देते हैं, जब
किसी विवाद का निर्णय वर्तमान कानून के अनुसार उस कानून में पायी जाने वाली किसी
कमी के कारण नहीं हो सकता। इस प्रकार औचित्यपूर्ण नियमों के द्वारा कानून का विकास
होता है तथा साथ-साथ अनुपयुक्त कानूनों में
सुधार और परिवर्तन भी होता है। प्रत्येक देश में औचित्यपूर्ण निर्णयों से उद्भूत
कानूनों का स्थान बड़ा महत्वपूर्ण होता है। इंगलैण्ड में तो संविधान और कानून के
विकास में औचित्यपूर्ण निर्णयों का बहुत अधिक योग रहा है। औचित्य के अनेक नियम हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं— ऐसी कोई त्रुटि नहीं होती जिसका उपचार न हो, जो औचित्य चाहता है उसके द्वारा स्वयं औचित्यपूर्ण व्यवहार
किया जाना चाहिए औचित्य समानता में ही निहित है, आदि।
(6) व्यवस्थापन (Legislation ) — व्यवस्थापन कानून का सबसे
अधिक प्रत्यक्ष और महत्वपूर्ण स्रोत है। प्राचीनकाल में व्यवस्थापन का कार्य राजा
अथवा उसके कुछ गिने-चुने लोगों द्वारा होता था
और एक समय सम्पूर्ण जनता के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से व्यवस्थापन भी किया जाता था, किन्तु आज लगभग सभी राज्यों में व्यवस्थापन का कार्य
व्यवस्थापिका (विधानमण्डल या संसद) द्वारा किया जाता है। व्यवहार रूप में प्रत्येक देश
में प्रायः सभी कानून विधानमण्डल द्वारा बनाये जाते हैं और व्यवस्थापन कानून के
प्रायः एकमात्र स्रोत का रूप धारण करता जा रहा है। गिलक्राइस्ट ने इस सम्बन्ध में
लिखा है कि “व्यवस्थापन कानून का प्रमुख
स्रोत है और यह अन्य स्रोतों पर प्रमुखता प्राप्त करता जा रहा है। प्रथाओं और
औचित्य का स्थान बहुत कुछ सीमा तक विधानी कानूनों ने ले लिया है। कानून के
संहिताबद्ध होने से कानूनों के स्रोत के रूप में न्यायिक निर्णयों का क्षेत्र बहुत
सीमित हो गया है और कानूनी टीकाओं का उपयोग तो केवल विचार-विमर्श के लिए ही किया जाता है।"
कानून
के स्रोतों की इस विवेचना के उपरान्त हम वुडरो विल्सन को उद्धृत करते हुए कह सकते
हैं "रीति-रिवाज विधि का सर्वप्रथम स्रोत है पर
धर्म भी उसी का समकालीन, उतना ही सफल और राष्ट्र के
विकास में लगभग वैसा ही स्रोत है। न्यायिक निर्णय अधिकारी बनकर आया और औचित्य के
साथ कदम मिलाकर चला। केवल व्यवस्थापन, जो कानून का विचारपूर्ण और चेतन संगठन है और वैज्ञानिक
व्याख्या जो कानून का विकास है,
राजनीतिक
समाज में उन्नत पद पर पहुंचने की प्रतीक्षा में है, ताकि वह विधि निर्माण में प्रबल प्रभाव डाल सके।” कानून के प्रारम्भिक स्रोतों का महत्व यद्यपि आज कम हो गया है, किन्तु आज भी वे व्यवस्थापन की अति पर अंकुश रखने का कार्य
करते हैं।
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