Determination of duties कर्तव्यों का क्रम निर्धारण
आदर्श नागरिकता के तत्वों में एक बहुत अधिक महत्वपूर्ण तत्व कर्तव्यों का क्रम निर्धारण है। 'कर्तव्यों के क्रम निर्धारण' का तात्पर्य यह है कि विभिन्न समुदायों के प्रति व्यक्तियों के जो कर्तव्य होते हैं, व्यक्ति के द्वारा उन कर्तव्यों की प्राथमिकता का क्रम निर्धारित किया जाय। उसके द्वारा यह मालूम किया जाना चाहिए। कि इन विभिन्न कर्तव्यों में उसका उच्चतम कर्तव्य कौन-सा है। विभिन्न समुदायों के प्रति कर्तव्यों का तुलनात्मक दृष्टि से सही रूप में ज्ञान प्राप्त होने पर ही व्यक्ति के द्वारा समाज के हित में सबसे अधिक श्रेष्ठ रूप में कार्य किया जा सकता है।(A much more important element in the elements of ideal citizenship is the ordering of duties. 'Ordering of duties' means that the order in which the duties of individuals towards different communities are determined by the individual. It should be known by him. Which is his highest duty among these various duties? Only by getting comparatively correct knowledge of duties towards different communities can one work in the best way in the interest of the society. )
समस्या की उत्पत्ति तथा व्याख्या(Origin and interpretation of the problem )
वर्तमान समय में मानव जीवन बहुमुखी हो गया है और व्यक्ति
अपने व्यक्तित्व के विकास हेतु एक साथ ही अनेक समुदायों का सदस्य होता है। व्यक्ति
एक ही समय पर परिवार, ग्राम, नगर, प्रान्त, राज्य तथा मानवता का सदस्य होता है। इसके साथ ही
ऐच्छिक समुदायों ने भी आज के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया है और
व्यक्ति के द्वारा आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, परोपकारी और मनोरंजनार्थ समुदायों की सदस्यता
प्राप्त की जाती है। इन सभी प्राकृतिक और ऐच्छिक समुदायों के द्वारा अपनी ओर से
व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास का यत्न किया जाता है। इन समुदायों के द्वारा
व्यक्तित्व के विकास में जो योग दिया जाता है उसके बदले में व्यक्तियों के
समुदायों के प्रति कुछ कर्तव्य होते हैं और व्यक्ति समुदायों के प्रति अपने
कर्तव्यों का पालन करें तभी ये समुदाय अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। अतः
व्यक्तियों के द्वारा प्राकृतिक व ऐच्छिक समुदायों के प्रति अपने कर्तव्यों का
पालन किया जाना चाहिए। अनेक बार विविध समुदाय के प्रति व्यक्तियों के ये कर्तव्य
परस्पर विरोधी स्थिति ग्रहण कर लेते हैं। उदाहरणार्थ, व्यक्ति श्रमिक संघ का सदस्य होता है और श्रमिक
संघ के द्वारा वेतन बढ़ोत्तरी के लिए अपने सदस्यों से हड़ताल का आह्वान किया जाता
है। इस स्थिति में श्रमिक संघ के प्रति व्यक्ति का कर्तव्य उसे हड़ताल में भाग
लेने के लिए प्रेरित करता है, किन्तु राज्य के
प्रति व्यक्ति का कर्तव्य उसे हड़ताल का विरोध करने के लिए प्रेरित करता है
क्योंकि हड़ताल से राष्ट्रीय उत्पादन में गिरावट आ जाती है। इसी प्रकार परिवार के
प्रति व्यक्ति का कर्तव्य व्यक्ति को अधिकाधिक आय प्राप्त करने के लिए प्रेरित
करता है, किन्तु समाज और
राज्य के प्रति उसका कर्तव्य इस बात की मांग करता है कि व्यक्ति के द्वारा आय
प्राप्ति के लिए अनुचित साधनों का प्रयोग न किया जाय। ऐसी स्थिति में प्रश्न
उपस्थित होता है कि व्यक्ति किन समुदायों के प्रति कर्तव्यों का पालन करे और किन
समुदायों के प्रति कर्तव्यों की अवहेलना कर दी जाय । कर्तव्यों के क्रम निर्धारण
की समस्या यही है।
कर्तव्यों के क्रम निर्धारण (Importance of ordering duties )
आज के जीवन में कर्तव्यों का क्रम निर्धारण बहुत ही अधिक महत्वपूर्ण है। व्यक्ति आदर्श नागरिक तभी बन सकता है जबकि उसके द्वारा विविध समुदायों के प्रति अपने कर्तव्यों को महत्व दिया जाय। कर्तव्यों के उचित क्रम निर्धारण के आधार पर ही व्यक्ति समाज, राज्य और मानवता की उन्नति में योगदान दे सकता है। कर्तव्यों का उचित क्रम निर्धारण आदर्श नागरिकता का सार है और विलियम बॉयड के शब्दों में कहा जा सकता है कि "कर्तव्यों के उचित क्रम निर्धारण में ही नागरिकता निहित है।'(Citizenship lies in the proper ordering of duties.)
read the👉👉👉न्याय की धारणा (Concept of Justice)
कर्तव्यों के क्रम निर्धारण की प्रक्रिया (The process of determining the order of duties )
कर्तव्यों के पालन का क्रम क्या हो इस सम्बन्ध में
मनुस्मृति के इस श्लोक से मार्ग निर्देश प्राप्त किया जा सकता है जिसमें कहा गया
है कि “परिवार या कुल
के लिए व्यक्ति का, ग्राम के लिए कुल
का, राज्य के लिए
ग्राम का और आत्मा के लिए पृथ्वी का त्याग कर दिया जाना चाहिए। अपने आप को एक
आदर्श नागरिक के रूप में रखते हुए डॉ. ऐलम्बर्ट(About Dr. Almbert) ने इस बात को इस प्रकार कहा कि "मैं निज के हित से अपने परिवार के हित को, अपने परिवार के हित से अधिक अपने देश के हित को
और अपने देश के हित से अधिक मानवता के हित को श्रेष्ठ समझता हूं।”” इन कथनों का तात्पर्य यही है कि व्यक्ति के
द्वारा बड़े हित के लिए छोटे हित का त्याग किया जाना चाहिए व्यापक हित के लिए
संकुचित हित का त्याग कर दिया जाना चाहिए। इस सन्दर्भ में बड़े या व्यापक हित का
तात्पर्य ऐसे हित से है जिसका सम्बन्ध अधिक व्यक्तियों के जीवन से है और छोटे या
संकुचित हित का तात्पर्य ऐसे हित से है जिसका सम्बन्ध अपेक्षाकृत कम व्यक्तियों के
जीवन से हो। वास्तव में महान या व्यापक हित की साधना से छोटे अथवा
संकुचित हितों की साधना स्वतः ही हो जाती है। अतः
कर्तव्यों के क्रम निर्धारण का सही रूप यही है कि व्यक्ति विशाल समुदायों के प्रति
अपने कर्तव्यों को छोटे समुदायों के प्रति कर्तव्य की अपेक्षा अधिक महत्व प्रदान
करे। सभ्यता और संस्कृति के विकास का इतिहास भी इस बात का साक्षी है कि "मनुष्य की उच्चतर प्रगति संकीर्ण स्वार्थ
को व्यापक हित के आश्रित करने में हुई है। "
कर्तव्यों के क्रम निर्धारण का व्यावहारिक रूप (The practical form of ordering duties )
कर्तव्यों के
क्रम निर्धारण का उपर्युक्त सूत्र ऊपर से देखने पर जितना सरल प्रतीत होता है, व्यवहार में उसे अपनाना उतना ही कठिन है।
कर्तव्यों के इस क्रम निर्धारण को व्यावहारिक रूप में अपनाने के लिए निम्नलिखित
प्रकार से विचार किया जा सकता है :
स्वयं के प्रति कर्तव्य (Duty towards oneself)
प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह अपने व्यक्तित्व का विकास करे क्योंकि शारीरिक, मानसिक और आत्मिक दृष्टि से स्वस्थ व्यक्ति ही समाज और राज्य की प्रगति में योग दे सकते हैं। अतः व्यक्ति के द्वारा अपने शरीर को पुष्ट करने, मस्तिष्क को विकसित करने और चरित्र को उन्नत करने के लिए प्रत्येक सम्भव प्रयत्न किया जाना चाहिए, लेकिन व्यक्ति के द्वारा अपने जीवन के विकास को ही सब कुछ नहीं समझ लिया जाना चाहिए, वरन् अपने जीवन को वृहत् सामाजिक जीवन की एक इकाई मात्र ही समझा जाना चाहिए और जब कभी अपने स्वार्थ का परिवार, नगर या राज्य के प्रति हित के साथ विरोध हो, तो व्यक्ति के द्वारा अपने स्वार्थ का त्याग कर दिया जाना चाह
परिवार के प्रति कर्तव्य(Duty to family)
व्यक्ति को जन्म देने, उसकी रक्षा करने तथा उसके जीवन को विकसित करने
की दिशा में परिवार के द्वारा अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य किये जाते हैं। अतः
व्यक्ति का यह कर्तव्य हो जाता है कि उसके द्वारा अपने परिवार की साधनसम्पन्नता और
परिवार के सदस्यों की सुख-सुविधा का ध्यान रखा जाय, लेकिन व्यक्ति का समस्त ध्यान परिवार पर
केन्द्रित नहीं हो जाना चाहिए। व्यक्ति के द्वारा इस हुए ही व्यतीत बात का ध्यान
रखा जाना चाहिए कि पारिवारिक जीवन नगर या राज्य के अन्तर्गत रहते किया जा सकता है
और सामाजिक जीवन का पारिवारिक जीवन पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ता है। अतः यदि
परिवार के प्रति कर्तव्य और नगर, समाज या राज्य के
प्रति कर्तव्य में परस्पर विरोध हो, तो परिवार के
प्रति कर्तव्य का त्याग कर दिया जाना चाहिए।
ग्राम या नगर के प्रति कर्तव्य(Duties towards village or town)
ग्राम या नगर के माध्यम से ही व्यक्ति अपना नागरिक जीवन
प्रारम्भ करता है और यही वह इकाई है जिसके अन्तर्गत रहते हुए व्यक्ति अपना आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन व्यतीत करता है। अतः
व्यक्ति के द्वारा ग्राम या नगर के प्रति कर्तव्यों का पालन तो किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही ग्राम या नगर के प्रति
कर्तव्यों की अपेक्षा राज्य या मानवता के प्रति कर्तव्यों को श्रेष्ठतर समझा जाना
चाहिए ।
समुदायों के प्रति कर्तव्य(Duties towards communities)
आज के जीवन में आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, परोपकार या मनोरंजन के क्षेत्र में कार्य करने वाले ऐच्छिक समुदाय बहुत अधिक महत्वपूर्ण हो गये हैं और इन समुदायों के बिना मानव जीवन के विकास की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। समुदाय अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर सकें इसके लिए व्यक्तियों द्वारा समुदाय के प्रति कर्तव्यों का पालन किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही यह तथ्य भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि इन समुदायों से राज्य अधिक महत्वपूर्ण है और सम्पूर्ण मानव जीवन के तो ये समुदाय एक छोटे से अंश मात्र ही है|
राज्य के प्रति कर्तव्य(Duty to the State)
राज्य सभ्य जीवन की प्रथम स्थिति है। राज्य के अन्तर्गत रहते अपना पारिवारिक जीवन व्यतीत करते और ग्राम, नगर तथा विविध समुदाय अपने कार्यों का सम्पादन करते हैं। अतः राज्य के प्रति भक्ति या देशभक्ति व्यक्ति का एक अत्यन्त उच्च कर्तव्य हो जाता है जिसका पालन अपने जीवन, परिवार, नगर या समुदाय के मूल्य पर भी अवश्य ही किया जाना चाहिए।
मानवता के प्रति कर्तव्य(Duty to humanity)
व्यक्ति राज्य के प्रति कर्तव्यों का पालन तो करें, लेकिन उनके द्वारा इस बात का ध्यान रखा जाना
चाहिए कि इससे भी महान् एक कर्तव्य होता है और वह है समस्त मानवता के प्रति। आज की
स्थिति में जबकि मनुष्य जाति के द्वारा बहुत अधिक शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों का
निर्माण कर लिया गया है, यह बात बहुत
आवश्यक हो गयी है कि 'जियो और जीने दो'('Live and let live') या विश्वबन्धुत्व की धारणा को
अपनाकर राष्ट्रीयता को अन्तर्राष्ट्रीयता के साथ, अपने राज्य के हितों का सम्पूर्ण मानवता के
हितों के साथ सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए। इस सम्बन्ध में डॉ. बेनीप्रसाद(About Dr. Beniprasad ) ठीक ही कहते है
कि "देशभक्ति
का सामंजस्य मानवता की भक्ति के साथ होना चाहिए नहीं तो सभी के यहां तक कि
शक्तिशाली लोगों के हित भी आगे चलकर नष्ट हो जायेंगे।"("Patriotism must be in harmony with devotion
to humanity, otherwise the interests of all, even the powerful, will perish in
the future." )
read the 👉👉👉 Ideal
Citizenship आदर्श नागरिकता
read the👉👉👉न्याय के सार्वलौकिक और
स्थिर आधार तत्व… (UNIVERSAL AND INVARIANT POSTULATES OF JUSTICE)
read the👉👉👉नागरिक और मतदाता (Citizens
and Voters)
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